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उत्तर प्रदेश के इस गांव में खेली जाती है जहरीले बिच्छूओं की होली, रंग नहीं एक-दूसरे पर फेंकते हैं बिच्छू

उत्तर प्रदेश की होली का नाम लेते ही फूलों की होली, लड्डूओं की होली, लट्ठमार होली से लेकर कीचड़ वाली होली या मणिकर्णिका घाट की चिता भस्म की मसान होली का नाम तक याद आ जाता है। लेकिन क्या आपको पता है, उत्तर प्रदेश के ही एक गांव में खेली जाती है बिच्छूओं वाली होली।

जी हां, इस गांव में लोग एक दूसरे पर गुलाल या गीला रंग नहीं बल्कि बिच्छू फेंकते हैं। जरा सोचिए, होली वाले दिन जहरीले बिच्छूओं वाली होली खेलने के बाद कितने लोगों को अस्पताल दौड़ना पड़ता होगा! क्या आप हम पर यकिन करेंगे अगर हम आपसे कहे, कि ये जहरीले बिच्छू एक भी व्यक्ति को डंक नहीं मारते! यह बिल्कुल सच है। आज के आधुनिक युग में भी यह एक ऐसी पहेली है, जिसे अभी तक सुलझाया नहीं जा सका है।

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कैसी होती है बिच्छूओं वाली होली?

होली वाले दिन जब ढोल और फाग की थाप पर लोग थिरकते हैं, तो उन थाप पर ही सैंकड़ों की संख्या में जहरीले बिच्छू जमीन से बाहर निकल आते हैं। बस फिर क्या है, जैसे ही बिच्छू अपनी बिल से बाहर निकलते हैं बच्चे से लेकर बुढो तक इन्हें अपने हाथों में उठाकर एक-दूसरे पर फेंकने लगते हैं।

इसे यहां होली खेलने की अनोखी परंपरा के तौर पर ही देखा जाता है। बिच्छूओं वाली यह होली खेली जाती है उत्तर प्रदेश के इटावा के ताखा क्षेत्र के सौंथना गांव में। बिच्छूओं वाली इस जहरीली होली के कारण आसपास के क्षेत्र में यह गांव हमेशा चर्चा का विषय बना रहता है।

होली की शुभकामनाएं देने आते हैं बिच्छू

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स्थानीय लोगों का कहना है कि आम दिनों में इस गांव में एक भी बिच्छू नजर नहीं आता है। लेकिन होली के दिन जब फाग की थाप पर सभी नाच-गाने में मगन रहते हैं, उसी समय गांव के बाहर भैंसान टीले पर सैंकड़ों की संख्या में अपने बिल से बाहर निकलने लगते हैं।

कहा जाता है कि ये बिच्छू स्वभाव से तो जहरीले होते हैं, लेकिन होली वाले दिन जब लोग इन्हें पकड़कर एक-दूसरे पर फेंकते हैं तो ये बिच्छू किसी को डंक नहीं मारते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि वे होली की शुभकामनाएं देने आते हैं। बताया जाता है कि सैंथना गांव में बिच्छूओं की होली खेलने की यह परंपरा सैंकड़ों साल पुरानी है।

किसी जमाने में था कोई मंदिर

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कहा जाता है कि गांव के जिस टीले पर बिच्छूओं रहते हैं, उस भैसान टीले पर किसी जमाने में कोई मंदिर भी हुआ करता था। स्थानीय लोगों का मानना है कि यहां कोई मंदिर था, जिसे मुगलों ने ध्वस्त कर दिया होगा। टीले पर आज भी मूर्तियों के अवशेष मिलते हैं। कहा जाता है कि इस टीले पर भैंसो की बलि चढ़ाई जाती होगी, इसी वजह से टीले का नाम भैंसान टीला पड़ा।

लोग आज भी यहां भैंसान बाबा की पूजा करने आते हैं। जब भी गांव में किसी की शादी होती है, तो उस समय टीले पर तेल चढ़ाने की परंपरा है। लोग अक्सर यहां मन्नत मांगने आते हैं और मुराद पूरी होने के बाद पूजा-अर्चना करते हैं।

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