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बनारस के इस मंदिर में जिंदा दफन की गयी थी बंगाल की एक राजकुमारी, क्यों करना पड़ा ऐसा?

बनारस के हर गली और मुहल्ले में किसी न किसी भगवान का मंदिर जरूर मिल जाएगा। यहां जितनी अधिक संख्या में मंदिर हैं, उतनी ही ज्यादा इन मंदिरों से जुड़ी कहानियां भी हैं। आज हम आपको बनारस के जिस मंदिर के बारे में बता रहे हैं, उसके बारे में कहा जाता है कि मंदिर की नींव में एक राजकुमारी को उसकी सगी मां ने जिंदा दफन कर समाधी पर ही मंदिर को खड़ा कर दिया।

varanasi tara mata temple

बनारस के दशाश्वमेध घाट के पास काली मंदिर से केदार घाट की तरफ बढ़ने पर स्थित है पांडेय घाट। पांडेय घाट देवनाथ पुरा मोहल्ले में है लाल रंग की एक कोठी। बनारस की पुरानी कोठियों जैसी ही दिखने वाली इस कोठी को बाहर से देखकर कुछ भी समझ में नहीं आता है। सीढ़ियों से अंदर प्रवेश करने पर यह आपको एक बड़ी सी हवेलीनुमा भव्य मंदिर लगेगी।

इस मंदिर में यूं तो कई देवता स्थापित हैं लेकिन यह मुख्य रूप से काशी की सिद्धपीठ तारा माता का मंदिर है। एक ऊंचे से चबुतरे पर स्थापित मां नील तारा का नीला विग्रह। विग्रह और मंदिर की बनावट को देखकर ही समझ में आता है कि यह हाल का नहीं बल्कि सैंकड़ों साल पुराना मकान है।

यकिन मानिए इस मंदिर को या मकान को देखकर किसी को एक पल के लिए भी यह आभास नहीं होगा कि इस मंदिर की नींव में एक राजकुमारी जिंदा दफन हुई थी। पर क्यों? क्यों एक मां जो एक राज्य की रानी भी थी, को अपनी सगी एकलौती बेटी की जिंदा समाधी बनानी पड़ी?

किसने बनवाया था यह मंदिर?

tara mata temple banaras

मां तारा को तंत्र साधना की देवी के रूप में पूजा जाता है। जैसे पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित शक्तिपीठ मां तारा का मंदिर तंत्र साधना का बड़ा केंद्र माना जाता है। ठीक वैसे ही बनारस का यह मंदिर भी मां तारा का ही मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण बंगाल क्षेत्र के एक राज्य नाटोर की रानी भवानी ने बनवाया था।

वर्ष 1752 से 1758 के बीच नाटोर की रानी भवनी ने इस मंदिर का निर्माण बनारस के पांडेय घाट के पास करवाया था। पर बंगाल की एक रानी ने बनारस जाकर मां तारा का मंदिर क्यों बनवाया? बता दें, नाटोर वर्तमान में बांग्लादेश का हिस्सा है, जो कभी अविभाजित बंगाल में हुआ करता था।

कौन सी राजकुमारी दफन है?

तारा माता मंदिर की नींव में जिस राजकुमारी को जिंदा दफना दिया गया था वह नाटोर की राजकुमारी तारा सुन्दरी थी। तारा सुन्दरी नाटोर की रानी भवानी की एकलौती बेटी थी। कहा जाता है कि तारा सुन्दरी बेहद सुन्दर थी। उनका विवाह बंगाल के खेजुरी गांव में रहने वाले रघुनाथ लाहिरी से हुआ था। लेकिन बड़ी ही कम उम्र में पति के चल बसने की वजह से वह विधवा हो गयी थी और नाटोर में अपनी मां के साथ रहा करती थी।

story behind tara mata temple varanasi

क्यों करना पड़ा था ऐसा?

स्थानीय लोगों से मिला जानकारी के अनुसार भवानी की शादी नाटोर के राजा रमाकांत से हुई थी। बताया जाता है कि नाटोर एक संपन्नशाली राज्य हुआ करता था। 1730 में इस राज्य की सालाना आय लगभग डेढ़ करोड़ रुपए थी। रमाकांत एक अय्याश किस्म का राजा निकला। विवाह के बाद पूरा राज्यभार रानी भवानी पर छोड़कर वह शराब में डूबा रहने लगा। जब राज्य पर मराठाओं का हमला हुआ तो उसमें महाराज रमाकांत मारे गये। रानी ने राज्यभार संभाल लिया।

इधर बेटी तारा सुन्दरी भी शादी के कुछ समय बाद ही विधवा हो गयी और मायके आ गयी। तारा सुन्दरी के रूप पर मोहित होकर मुगलशासक सिराजुद्दौला ने उससे शादी करने का ऐलान कर दिया। नवाब से बचने के लिए रानी भवानी बेटी तारा सुन्दरी को लेकर गंगा के रास्ते बनारस भाग आयी, लेकिन मुसीबत ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। सिराजुद्दौला बारात और अपनी सेना लेकर काशी की ओर चल पड़ा।

history of varanasi tara mata temple

जैसे ही रानी भवानी को इसकी जानकारी मिली तो तारा सुन्दरी ने अपनी मां से कहा, "मुझे जिंदा दफना दिया जाए लेकिन उस विधर्मी (दूसरे धर्म का) के हाथ न लगने दिया जाए।" कहा जाता है कि कोई उपाय न देखकर नाटोर की रानी भवानी ने अपनी बेटी तारा सुन्दरी को जमीन में जिंदा गाड़ दिया और उनकी समाधी पर तारा माता का मंदिर बनवाकर इसमें मां तारा का नीला विग्रह स्थापित करवाया।

रानी ने काफी दान किया

कहा जाता है कि जिंदा बेटी की समाधी बनाने के बाद रानी भवानी ने बनारस में काफी दान-पूण्य किया था। माना जाता है कि पंचक्रोशी यात्रा के मार्ग में आने वाले सभी धर्मशालाएं, कुएं और तालाब रानी भवानी ने ही बनवाए थे। इतिहासकारों का कहना है कि काशी के सभी घाट, मंदिर, तालाब या कुंड या तो रानी अहिल्याबाई के बनवाए हुए थे या फिर रानी भवानी के। बनारस की माता तारा मंदिर में पूरा करने की पूरी विधि उन्होंने तारापीठ के जैसी ही रखवायी थी।

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