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पुरी के जगन्नाथ मंदिर के प्रसाद को क्यों कहा जाता है महाप्रसाद! क्या है इसकी खासियत?

पुरी के जगन्नाथ देव को सबसे ज्यादा दयालु भगवान के रुप में पहचान मिली हुई है, जो अपने किसी भी भक्त को भूखा नहीं देख पाते हैं। हर साल 8 दिनों के लिए अपनी मासी के घर गुंडिचा मंदिर जाने के लिए रथ पर सवार होकर बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ जगन्नाथ प्रभु अपने मंदिर से बाहर निकलते हैं।

इस रथ यात्रा को ओडिशा के पुरी में एक उत्सव के तौर पर मनाया जाता है जिसमें शामिल होने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। सिर्फ उत्सव ही नहीं जगन्नाथ मंदिर में साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है और मंदिर का महाप्रसाद प्राप्त कर भक्त स्वयं को धन्य समझते हैं। पुरी के जगन्नाथ मंदिर की रसोई एक मेगा किचन है, जहां सिर्फ भाप के द्वारा भोजन पकाया जाता है।

आइए इस मेगा किचन और इसमें पकने वाले महाप्रसाद की खासियतों के बारे में बताते हैं :

देवी महालक्ष्मी स्वयं करती हैं देखरेख

Mahaprasad

जगन्नाथ पुरी की रसोई दुनिया की सबसे विशाल रसोईयों में से एक है। इस रसोई में बना खाना ना तो कभी बर्बाद होता है और ना ही कभी कम पड़ता है। जगन्नाथ मंदिर की इस विशाल रसोई में पकाया गया खाना भगवान को भोग चढ़ाने से पहले कभी चखा तक नहीं जाता है लेकिन व्यंजनों के स्वाद में कोई कमी नहीं होती है। स्थानीय लोगों का मानना है कि जगन्नाथ मंदिर की रसोई में पकने वाला हर व्यंजन देवी महालक्ष्मी की देखरेख में बनता है। इस वजह से ही ना कभी अन्न की बर्बादी होती है और ना ही खाना कम पड़ता है। यहां तक की भोजन के स्वाद में भी कभी कोई कमी नहीं आती है।

प्रसाद क्यों कहलाता है महाप्रसाद

आमतौर पर किसी भी मंदिर में भगवान को चढ़ाया जाने वाला भोग 'प्रसाद' कहलाता है लेकिन पुरी में भगवान जगन्नाथ को जो भोग चढ़ाया जाता है, उसे 'महाप्रसाद' कहा जाता है। इसके बारे में एक लोककथा है कि एक बार प्रभु वल्लभाचार्य एकादशी के व्रत के समय पुरी के जगन्नाथ मंदिर में पहुंचे थे। वहां उन्हे प्रसाद दिया गया। इसके बाद उन्होंने भगवान की स्तुति शुरू कर दी।

prasad

उनकी स्तुति द्वादशी पर समाप्त हुई और उसके बाद उन्होंने प्रसाद ग्रहण किया। इसके बाद से ही पुरी के जगन्नाथ मंदिर के प्रसाद को 'महाप्रसाद' कहा जाने लगा। इस मेगा रसोई में हर रोज करीब 80 हजार लोगों के लिए खाना बनता है। भगवान जगन्नाथ को चढ़ाने के लिए 56 भोग बनाए जाते हैं, इस वजह से भी इस मंदिर के प्रसाद को महाप्रसाद कहा जाने लगा।

विशेष प्रकार से पकाया जाता है महाप्रसाद

जगन्नाथ मंदिर में पकाए जाने वाले महाप्रसाद की तकनीक काफी खास होती है। सभी व्यंजनों को मिट्टी के बर्तन में ही पकाया जाता है। चुल्हे पर भोग को पकाते समय एक के ऊपर एक इस तरह से 7 बर्तन रखे जाते हैं। सभी व्यंजन भाप से पकते हैं। खास बात यह है कि जो बर्तन सबसे ऊपर रखा जाता है, आश्चर्यजनक रूप से उस बर्तन का खाना सबसे पहले पकता है।

mega kitchen of Jagannath Temple

उसके बाद ऊपर से नीचे के क्रम में एक-एक कर सभी व्यंजन पकते हैं। जगन्नाथ मंदिर में भोग स्वरुप पकने वाले सभी भोजन के लिए अन्न को मंदिर प्रशासन द्वारा ही साल भर उगाया जाता है। चार धाम में से एक जगन्नाथ धाम में महाप्रसाद को शुद्ध शाकाहारी तरीके से पकाया जाता है। मंदिर प्रांगण में स्थित दो कुंए, गंगा और यमुना के पानी का उपयोग ही खाना पकाने के लिए किया जाता है।

हर रोज पकते हैं 50 क्विंटल चावल

मीडिया रिपोर्ट्स से मिली जानकारी के अनुसार जगन्नाथ मंदिर के मेगा किचन में हर रोज करीब 50 क्विंटल चावल, 20 क्विंटल दाल और 15 क्विंटल सब्जी पकती है। इतनी भारी मात्रा में भोजन को पकाने के लिए कुल 752 चुल्हों, जिसमें से 240 पक्के और बाकी कच्चे, का उपयोग किया जाता है। इस मेगा रसोई में 500 रसोईए और 300 सहायक मिलकर भोग पकाने का काम करते हैं।

Bhog

एक-एक सेवक के जिम्मे 3 चुल्हें होते हैं। भोग पकाने के बाद सबसे पहले देवी विमला, जो मां पार्वती का ही एक रूप हैं, को भोग चढ़ाया जाता है, जिसके बाद भगवान जगन्नाथ को उनके भाई-बहनों समेत भोग अर्पित किया जाता है। मंदिर में भोग का वितरण होने के साथ-साथ काफी कम मूल्यों पर भक्तों को भोग बेचा भी जाता है। इसके अलावा भोग में पके चावल को सुखा कर भी उसे महाप्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।

FAQs
क्या जगन्नाथ देव को मांसाहार अर्पित किया जाता है?

भगवान जगन्नाथ श्रीकृष्ण का ही एक स्वरुप हैं। वह शुद्ध शाकाहारी हैं। इसलिए उनके भोग में मांसाहार, यहां तक कि प्याज-लहसुन तक नहीं डाला जाता है।

प्रसाद और महाप्रसाद में क्या अंतर है?

किसी भी मंदिर या तीर्थ स्थान पर मिलने वाले भगवान के भोग को प्रसाद कहा जाता है लेकिन जगन्नाथ मंदिर में मिलने वाले भगवान के भोग को महाप्रसाद कहा जाता है।

जगन्नाथ मंदिर का महाप्रसाद कैसे मिलता है?

जगन्नाथ मंदिर में महाप्रसाद मिट्टी के बर्तन में पकाया और उसी में वितरित किया जाता है। मंदिर में महाप्रसाद वितरित करने के साथ-साथ काफी कम मूल्य पर बेचा भी जाता है। मंदिर प्रशासन से संपर्क कर भक्त चाहे तो इन्हें खरीद सकते हैं।

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