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फलाने की पत्नी या फलाने की माता...पहले Voter List में यूं दर्ज हुई थीं महिलाएं, कैसे हुआ बदलाव!

पिछले 1 महीने से ज्यादा समय से चल रहा लोकसभा चुनावों का शोर अब बस थमने ही वाला है। 1 जून को देश के कई मतदान केंद्रों पर 7वें और आखिरी चरण का मतदान होगा जिसके बाद 4 जून को मतगणना के साथ चुनावों का परिणाम घोषित कर दिया जाएगा। आम चुनाव 2024 के माध्यम से 18वीं लोकसभा के सदस्यों का चुनाव किया जा रहा है।

अपने नेता और देश के प्रधानमंत्री का चुनाव करने के लिए महिलाएं या पुरुष आज समान रूप से भागीदार हैं। 18 साल की आयु पूरी करने के साथ ही चुनावों में मतदान करना हर भारतीय युवा का संवैधानिक अधिकार होता है। उनके 18 साल पूरा करते ही हर परिवार की तरफ से अपने बच्चों का नाम मतदाता सूची में दर्ज करवा दिया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भारत में पहली मतदाता सूची कैसे बनी थी?

loksabha election 2024

पुराने जमाने में भारत में जहां महिलाओं को घर के पुरुषों के नाम से पहचान मिलती थी, उनका नाम कैसे दर्ज हुआ था? सबसे पहले किसके मन में यह विचार आया कि हर मतदाता की अपनी अलग पहचान, उसका वोटर कार्ड होगा?

चलिए आपको भारत के पहले आम चुनाव से संबंधित कुछ दिलचस्प जानकारियां देते हैं :

कौन थे पहले चुनाव आयुक्त?

बात भारत को आजादी मिलने के चंद साल बाद की है। वर्ष 1950 में जब भारत का संविधान लागू हो चुका था, तब देश में लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार बनाने का निर्णय लिया गया। इतने बड़े देश में चुनाव करवाना और लोकतांत्रिक रूप से सरकार का गठन करना कोई मामूली बात तो नहीं थी। इसलिए चुनाव का कार्य ठीक तरीके से संपन्न करवाने के लिए भारत में चुनाव आयोग का गठन किया गया।

चुनाव आयोग के पहले आयुक्त, जिनके कंधों पर देश का पहला आम चुनाव संपन्न कराने की जिम्मेदारी सौंपी गयी वह थे सुकुमार सेन। बता दें, लोकसभा चुनाव 2024 संपन्न करने की जिम्मेदारी मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार पर है।

women get their right to vote

मिला मतदान का अधिकार पर दर्ज नहीं हुआ 40 लाख महिलाओं का नाम

भारत उन चुनिंदा देशों में से एक है जहां महिलाओं को मतदान का अधिकार लोकतंत्र की स्थापना के साथ ही दिया गया था। सिर्फ इतना ही नहीं, जिस समय कई यूरोपिय देशों और खासतौर पर अमेरिका में महिलाओं को मतदान प्रक्रिया में हिस्सा लेने का अधिकार भी नहीं था, तब भारत ने महिला-पुरुष का विभेद मिटाकर महिलाओं को चुनाव प्रक्रिया में शामिल होने का बराबर का अधिकार दिया था। भारत में महिलाओं को मतदान करने का अधिकार तो मिल गया था लेकिन लगभग 40 लाख महिलाओं का नाम पहली मतदाता सूची में शामिल ही नहीं हो पाया था। क्यों? इसकी वजह भी बड़ी दिलचस्प है।

फलाने की पत्नी या फलाने की बेटी

कड़ी मशक्कत के बाद सुकुमार सेन और उनकी टीम ने देशभर को अलग-अलग चुनावी क्षेत्रों में बांटा जिसके आधार पर मतदाता सूची (Voter List) बनाने का काम भी शुरू हो गया था। मतदाता सूची में नाम दर्ज करने के लिए जब चुनाव आयोग के लोग घर-घर पहुंच रहे थे, तब पुरुष तो खुशी-खुशी अपना नाम बता दे रहे थे लेकिन महिलाएं...!

women voter loksabha election 2024

जब पहली मतदाता सूची तैयार हुई तो पता चला कि उसमें करीब 40 लाख ऐसी महिलाएं भी शामिल हैं, जिन्होंने अपना नाम 'फलाने की माता', 'फलाने की बेटी' या 'फलाने की पत्नी' लिखवाया था। दरअसल, उस समय भारत में पुरुष-प्रधान समाज का प्रचलन था। इस वजह से महिलाएं अपने नाम से नहीं बल्कि पिता, पति या बेटे के नाम से ही पहचानी जाती थीं।

यूं मिली महिलाओं को अपने नाम से पहचान

बस फिर क्या था...चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन अड़ गये। उन्होंने कहा कि यह आजाद भारत की मतदाता सूची है। इसलिए यहां महिलाओं को उनके नाम से ही पहचान मिलेगी। इसके बाद घर-घर जाकर फिर से मतदाता सूची में नाम जोड़ने का काम शुरू हुआ लेकिन इस बार महिलाओं का नाम उनके अपने नाम से दर्ज किया गया न कि फलाने की पत्नी या बेटी के नाम से। बताया जाता है कि आजादी के समय में भारत में मतदाताओं की संख्या लगभग 17 करोड़ थी। 17 करोड़ मतदाताओं ने 3200 विधायकों और 489 सांसदों का चुनाव लोकसभा के लिए किया था।

election via ballet paper

कैसे संपन्न हुआ पहला आम चुनाव

  • चुनाव आयोग ने पहले मतदान को ठीक तरीके से संपन्न करवाने के लिए 3 लाख से ज्यादा अधिकारियों व चुनावकर्मियों को ट्रेनिंग दी थी।
  • देश का पहला आम चुनाव अक्तूबर 1950 से फरवरी 1952 के बीच संपन्न करवाया गया था।
  • प्रत्येक मतदान केंद्र पर हर प्रत्याशी के लिए अलग-अलग मतपेटी का इस्तेमाल किया गया।
  • मतदाताओं को खाली बैलट पेपर दिया गया था, जिसे वो अपने पसंदीदा प्रत्याशी की मतपेटी में डाल देते थे।
  • देश भर में लगभग 20 लाख स्टील के बॉक्स का इस्तेमाल मतपेटी के तौर पर किया गया था।
  • शुरुआती दो चुनावों इसी पद्धति से करवाएं गये थे, जिसके बाद बैलट पेपर पर मुहर लगाने की प्रक्रिया शुरू हुई।
election commission training evm
  • अगले लगभग 40 सालों तक बैलट पेपर पर मुहर लगाने की प्रक्रिया चलती रही। साल 2004 से चुनाव आयोग संपूर्ण रूप से EVM (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) का उपयोग कर रही है।
  • वर्ष 1993 में पहली बार मुख्य चुनाव आयुक्त T.N. शेषन के कार्यकाल में वोटर कार्ड पेश किया गया था।

*विभिन्न मीडिया स्रोतों से मिली जानकारी के आधार पर

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