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छठ पूजा स्पेशल : 9 लाख सालों पहले हुए था बिहार के इस सूर्य मंदिर का निर्माण, कोणार्क मंदिर से है समानता

बिहार ऐसा राज्य है जहां दिवाली बीत जाने के बाद भी घरों में लगी रंगीन लाइट्स की लड़ियों को खोल कर उतारा नहीं जाता है बल्कि दिवाली के बाद भी रोज नियम से इन्हें जलाया जाता है। दरअसल, बिहार में दिवाली की अगली रात को छोटी दिवाली के तौर पर मनाया जाता है। छोटी दिवाली बीतने के ठीक 4 दिनों बाद ही शुरू होता है लोकआस्था का महापर्व छठ पूजा।

एक तरह से कहा जा सकता है कि बिहार के बाजारों की असली रोनक तो दिवाली के बाद ही शुरू होती है जब लोग छठ पूजा के लिए सामान जैसे दौरा, सुपली, डगरा आदि की खरीदारी करते हैं। छठ पूजा ही एकमात्र ऐसा व्रत होता है जहां उगते सूर्य से पहले डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। छठ पूजा को सूर्य उपासना का व्रत भी कहा जाता है। क्या आपको पता है बिहार में तीन सूर्य मंदिरों का एक हिस्सा 'देवार्क' भी स्थित है। कहा जाता है कि इसकी स्थापना करीब साढ़े 9 लाख साल पहले की गयी थी। यह मंदिर बिहार के औरंगाबाद जिले में मौजूद है।

3 स्वरूपों में होती है भगवान भाष्कर की पूजा

हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार भगवान सूर्य दुनिया में एकमात्र जीवित व साक्षात भगवान माने जाते हैं। पटना से करीब 140 किमी की दूरी पर औरंगाबाद में मौजूद देवार्क मंदिर भगवान सूर्य को समर्पित कोई सामान्य मंदिर नहीं है। इस मंदिर में भगवान सूर्य की पूजा उनके 3 प्रमुख स्वरूपों उदयाचल, मध्यांचल और अस्ताचल में की जाती है। मंदिर का निर्माण आयताकार, अर्द्धवृत्ताकार और वर्गाकार पत्थरों को काटकर किया गया है। कहा जाता है कि इस मंदिर की बनावट काफी हद तक ओडिशा के मंदिरों की वास्तुकला से मिलती-जुलती है।

9 लाख 50 हजार सालों पहले हुआ था निर्माण

स्थानीय लोगों की मान्यताओं के अनुसार देवार्क सूर्य मंदिर का निर्माण करीब 9 लाख 50 हजार सालों पहले भगवान विश्वकर्मा ने अपने हाथों से किया था। मंदिर के प्रवेश द्वार के पास बने शिलालेख के मुताबिक इस मंदिर का निर्माण माघ शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को त्रेतायुग में किया गया था। साथ ही शिलालेख में इस बात का उल्लेख भी है कि त्रेतायुग के 12 लाख 16 हजार वर्ष बीत जाने के बाद इस मंदिर का शिलान्यास किया गया था।

chhath puja

शिलालेख के अनुसार त्रेतायुग 12 लाख 86 हजार वर्षों का था। उसमें से यदि 12 लाख 16 हजार वर्ष घटा दिये जाएं तो 80 हजार बचते हैं। इसके बाद आया द्वापरयुग जिसमें 8 लाख 64 हजार वर्ष थे। वहीं कहा जाता है कि कलयुग के 6128 वर्ष बीत चुके हैं। इस हिसाब से यह मंदिर करीब 9 लाख 49 हजार 128 साल पुराना है। इस मंदिर को तैयार करने में कहीं भी सीमेंट का इस्तेमाल नहीं किया गया है बल्कि लोहे की कील से पत्थरों को जोड़ा गया था। वहीं इतिहासकारों का मानना है कि इस मंदिर का निर्माण छठवीं-8वीं सदी के बीच किया गया था।

कोणार्क मंदिर से क्या है समानता

औरंगाबाद के देवार्क मंदिर और ओडिशा के कोणार्क मंदिर के केवल नामों में ही समानता नहीं है, बल्कि इन दोनों मंदिरों का आपस में और बनारस को लोलार्क मंदिर भी आपस में जुड़े हुए हैं। कहा जाता है कि भगवान शिव के त्रिशुल के प्रहार से जब सूर्य देव के 3 टूकड़े हो गये तो उनमें से एक ओडिशा के कोणार्क में, दूसरा बिहार के औरंगाबाद में (देवार्क) और तीसरा हिस्सा उत्तर प्रदेश के काशी (लोलार्क) में गिरा था।

यानी देवार्क मंदिर 3 सूर्य मंदिरों का एक हिस्सा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक बार जब भगवान शिव के दो गण माली-सुमाली महादेव की तपस्या कर रहे थे, तो भगवान इंद्र को उनसे भय हुआ। तब उनकी आज्ञा से भगवान सूर्य ने अपना ताप बढ़ा दिया और उन्हें जलाने का प्रयास किया। इसी बात से नाराज भगवान शिव ने अपने त्रिशुल से भगवान सूर्य को भेद दिया था।

मंदिर की वास्तुकला

कोणार्क मंदिर के तर्ज पर ही इस मंदिर में भी भगवान सूर्य 7 घोड़ों के रथ पर सवार हैं। यह भगवान सूर्य का एकलौता ऐसा मंदिर है, जिसके द्वार पश्चिम दिशा की तरफ है। मंदिर को काले पत्थरों को तराशकर बनाया गया है और हर पत्थर पर नक्काशी व कलाकृति की गयी है। मंदिर में जिस प्रकार की कलाकृति की गयी है, वैसी कलाकृति आम तौर पर दक्षिण भारत के मंदिरों में देखने को मिलती है। इस मंदिर की बनावट काफी हद तक ओडिशा से मंदिरों से भी मिलती है। 100 फीट ऊंचे इस सूर्य मंदिर के सबसे ऊपर कमल के फूलों के आकार का गुंबद बना हुआ है, जिसपर 5 फीट ऊंचा सोना का कलश स्थापित है।

पुरानी कहानी के मुताबिक त्रेता युग में इला के पुत्र ऐल कुष्ठ रोग से पीड़ित था। एक बार शिकार खेलते वक्त वह गंदा हो गया और इस स्थान पर सरोवर में उसने छलांग लगा दी। सरोवर के जल से वह साफ हुआ, साथ में उसका कुष्ठ रोग भी ठीक गया। सपने में उसे इसी सरोवर में मिट्टी के अंदर भगवान सूर्य की मूर्तियां दबी होने की जानकारी मिली। उसने सरोवर में से मूर्तियां निकाली और उन्हें यहां मंदिर बनवाकर स्थापित करवाया। इस सरोवर में आज भी छठ व्रती पूजा करने आते हैं।

ना तेज भूकंप और ना औरंगजेब पहुंचा सका नुकसान

स्थानीय लोगों का मानना है कि दूसरे हिंदू मंदिरों की तरह ही देवार्क मंदिर को भी नुकसान पहुंचाने और तोड़ने के उद्देश्य से औरंगजेब यहां आया था। जब स्थानीय लोगों ने उससे मंदिर ना तोड़ने का अनुरोध किया तो उसने लोगों के सामने असंभव सा लगने वाला एक शर्त रख दिया। औरंगजेब ने कहा कि अगर मंदिर का मुख्य दरवाजा (स्थानीय लोगों के अनुसार उस समय पूर्व दिशा की ओर था) रातोंरात पश्चिम दिशा की ओर घूम गया तो वह मंदिर को नहीं तोडे़गा। ऐसा कहकर वह वहां से चला गया। कहा जाता है कि उसके बाद रातोंरात ना जाने कैसे इस मंदिर का द्वार पश्चिम दिशा की ओर घूम गया।

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अब तक बिहार और पास ही मौजूद नेपाल में आए कई भयावह भूकंपों का यह मंदिर साक्षी रह चुका है लेकिन उनसे इसे जरा भी नुकसान नहीं पहुंचा है। हालांकि समय के साथ मंदिर के गर्भगृह के पत्थर में थोड़ी सी दरार नजर आ रही है। जानकारों के मुताबिक यह हल्की दरार भी मंदिर को बड़ा नुकसान पहुंचा सकती है क्योंकि यह मंदिर पूरी तरह पत्थरों के संतुलन पर ही टिका हुआ है। हर साल चैती व कार्तिक छठ के समय यहां लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं।

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