पिछले कई दिनों से सुर्खियों में दिल्ली का वायु प्रदूषण बना हुआ है। दिल्ली-NCR इन दिनों दमघोंट रही प्रदूषण की मार झेल रहा है। लोग घरों से बाहर निकलने से पहले 100 बार सोच रहे हैं। बाहर स्मॉग की वजह से लोगों की आंखें और सीने में जलन की समस्या उत्पन्न रही है। दिल्ली के प्रदूषण में 1 घंटा बिताना 25 से 30 सिगरेट एक बार में फुंकने जैसा बताया जा रहा है।

ऐसे में वायु प्रदूषण को कम करने के लिए दिल्ली में आर्टिफिशियल रेन यानी कृत्रिम बारिश का सहारा लिया जा सकता है। बताया जाता है कि दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने आईआईटी कानपुर के साथ इस बारे में बैठक की। शुक्रवार को दिल्ली के पर्यावरण मंत्री ने एक बार फिर से बैठक की और उसके बाद प्रेस कांफ्रेंस में घोषणा की अगर सब कुछ ठीक रहा और कृत्रिम बारिश की परमिशन मिल गयी तो 20 और 21 नवंबर को दिल्ली में कृत्रिम बारिश करवायी जा सकती है। केजरीवाल सरकार पहली बार कृत्रिम बारिश का प्लान बना रही है।
पर दिल्ली में कैसे होगी बिन बादल बरसात?
दिल्ली में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए कृत्रिम बारिश का सहारा लिया जाएगा जिसके लिए क्लाउड सीडिंग प्रक्रिया की मदद ली जाएगी। क्लाउड सीडिंग प्रक्रिया में वैज्ञानिक आसमान में एक निश्चित ऊंचाई पर सिल्वर आयोडाइड, ड्राई आइस और साधारण नमक या क्लोराइड को बादलों के ऊपर छोड़ते हैं। यह कृत्रिम तरीके से बारिश करवाने की एक प्रक्रिया है, जिसमें बादलों के बीच से होकर छोटे-छोटे विमानों को गुजारा जाता है। इससे बादलों पर पानी की बूंदे बनती हैं जो थोड़ा जमा होने के बाद धरती पर बारिश के रूप में बरसने लगती है।
कौन सी परिस्थितियां होंगी जिम्मेदार?
क्लाउड सीडिंग किसी भी परिस्थिति में नहीं करवायी जा सकती है। क्लाउड सीडिंग के लिए विशेष परिस्थितियों का होना अनिवार्य है। इसके लिए आसमान में कम से कम 40% बादलों का होना जरूरी है, जिनमें पहले से ही थोड़ा पानी मौजूद हो। समस्या यह है कि नवंबर में दिल्ली के आसमान में बादलों की मात्रा काफी कम होती है। इसलिए क्लाउड सीडिंग में यह परेशानी का सबब बन सकती है।
इसके साथ ही वातावरण में थोड़ी नमी की मात्रा का होना भी आवश्यक है। अगर मौसम पूरी तरह से ड्राई होगा तो पानी की बूंदें जमीन पर पहुंचने से पहले ही भाप बनकर उड़ जाएगी। लेकिन सर्दियों के मौसम में दिल्ली के वातावरण में नमी का होना भी एक बड़ा सवाल है।

कानपुर आईआईटी ने किया है कृत्रिम बारिश का ट्रायल
कानपुर आईआईटी ने छोटे विमान से कृत्रिम बारिश के छोटे-छोटे ट्रायल किये हुए हैं। साल 2019 में भी दिल्ली में कृत्रिम बारिश की तैयारी की गयी थी, लेकिन उस समय बादलों की कमी और ISRO की अनुमति नहीं मिलने की वजह से वह मामला टल गया था। अब तक दुनिया में 53 देशों में इस तरह का प्रयोग किया जा चुका है। अगर दिल्ली में इस बार कृत्रिम बारिश करवायी जाती है तो उस पर करीब 10 से 15 लाख रुपए का खर्च आ सकता है।
हालांकि वैज्ञानिक स्मॉग या प्रदूषण का स्थायी इलाज कृत्रिम बारिश को नहीं मानते हैं। इससे कुछ दिनों यानी 4-5 दिनों से लेकर 10 दिनों तक राहत जरूर मिल सकती है। लेकिन इसमें एक समस्या यह है कि अगर हवा की गति किसी वजह से बढ़ गयी और रसायन दिल्ली के बजाए किसी और शहर या जिले के ऊपर चली जाती है तो पूरी मेहनत बेकार भी हो सकती है।
यानी कृत्रिम बारिश करवाने की तैयारी तो दिल्ली पर की जा रही है लेकिन बादल बरस मेरठ पर जाते हैं। इसलिए क्लाउड सीडिंग से पहले हवा और बादलों की गतिविधियों की सटिक गणना करना भी बेहद महत्वपूर्ण है।



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