हिंदू धर्म के अनुसार अब तक पृथ्वी पर 4 युग हुए जिसमें त्रेता युग में भगवान विष्णु, प्रभु श्रीराम के तौर पर धरती पर अवतरीत हुए। उनके समयकाल का सबसे बड़ा खलनायक लंकापति रावण था, जिसने माता सीता का अपहरण करने का दुःस्साहस किया था। दुनिया के कोने-कोने में फैले हिंदू धर्म को मानने वाले श्रद्धालुओं से अगर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की एक अच्छाई पूछी जाए तो वे उनकी 10 अच्छाईयां गिनवा सकते हैं।

राक्षसराज रावण के अहंकार और क्रुरता की कहानियां भी दुनियाभर में मशहूर है। लेकिन क्या आपको पता है कि रावण सिर्फ एक अहंकारी राजा ही नहीं बल्कि एक महाज्ञानी भी था, जिसके ज्ञान से स्वयं भगवान श्रीराम भी प्रभावित थे। इसी वजह से जब सेतु समुद्रम पार करने के बाद रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए प्रभु श्रीराम ने यज्ञ किया तो उसमें उन्होंने ना सिर्फ खुद रावण को सम्मिलित किया बल्कि उससे विजय का आर्शीवाद भी लिया था। क्या आप जानते हैं, रावण जब मरणासन्न अवस्था में था, तब भगवान श्रीराम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को उससे ज्ञान प्राप्त करने के लिए भी भेजा था।

दशहरा पर अंधकार के प्रतीक रावण का दहन कर प्रकाश की स्थापना की जाती है। इस साल दशहरा पर रावण-दहन से पहले जानिए क्यों रावण को एक महाज्ञानी का दर्जा प्राप्त था? रावण में वो कौन सी अच्छाईयां थी, जिससे भगवान श्रीराम भी प्रभावित हुए थे?
परमशिवभक्त :-
कहा जाता है कि रावण जैसा शिवभक्त आज तक इस पृथ्वी पर उत्पन्न नहीं हुआ है। वर्तमान समय में हम जिस शिव-तांडव स्रोत का पाठ करके भगवान शिव को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं, उसकी रचना राक्षशराज रावण ने ही की थी। दरअसल, एक बार अपने पुष्पक विमान पर सवार होकर रावण कैलाश के ऊपर से गुजर रहा था। तब शिवगण नंदी ने उन्हें ऐसा करने से रोका, क्योंकि भगवान शिव उस समय तपस्यारत थे।

तब रावण ने गुस्से में आकर भगवान शिव समेत सम्पूर्ण कैलाश पर्वत को ही उठाने का प्रयास किया लेकिन महादेव ने अपने पैरों की छोटी ऊंगली से कैलाश को दबा दिया और रावण का हाथ भी कैलाश के नीचे दब गया। तब दर्द से कराहते हुए रावण ने शिव-तांडव स्रोत की रचना करते हुए भगवान शिव की स्तुति की थी।
प्रकांड विद्वान :-
दशानन रावण सिर्फ एक अहंकारी राजा ही नहीं था बल्कि वह धर्म व वेदों का परम् ज्ञाता भी था। भगवान श्रीराम ने जब रावण पर विजय पाने के लिए विजय यज्ञ किया था, तब उसमें बतौर महाज्ञानी उन्होंने रावण को भी शामिल होने का न्यौता दिया था जिसे रावण ने स्वीकार भी कर लिया था। रावण ने ना सिर्फ भगवान राम का यज्ञ पूर्ण करवाया था बल्कि उन्हें विजय प्राप्त करने का आर्शीवाद भी दिया था।

जब रावण से उसके अनुयायियों ने इसके बारे में पूछा तो रावण ने कहा था, "राम को यह आर्शीवाद महापंडित रावण ने दिया है, राजा रावण ने नहीं।" रावण ने कई चिकित्सा और तंत्र ग्रंथों की रचना भी की थी। कहा जाता है कि रावण द्वारा रचित ग्रंथ 'अर्कप्रकाश' में गर्भस्थ शिशुओं को कष्ट, रोग आदि के बारे में, 'कुमारतंत्र' में चेचक, छोटी माता, बड़ी माता आदि मातृ व्याधियों के लक्षण और बचाव के उपायों का उल्लेख किया गया है।
राजनीति का ज्ञाता :-
रावण राजनीति और कूटनीति का ज्ञाता था। रावण राजनीति का इतना बड़ा ज्ञाता था कि जब वह मृत्युशैया पर था, तब भगवान राम ने लक्ष्मण को उसके पास राजनीति की शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेजा था। लक्ष्मण अज्ञानतावश रावण के सिर की तरफ खड़े हो गये थे। लेकिन रावण ने उनकी ओर से यह कहते हुए अपना मुंह फेर लिया था कि कुछ सीखने के लिए याचक की तरह पैरों के पास खड़ा होना पड़ता है। बाद में जब लक्ष्मण उसके पैरों की तरफ खड़े हुए तो रावण ने उन्हें राजनीति के कई गुढ़ रहस्य भी समझाएं थे।
रावण की मायावी शक्तियां :-

रावण के पास ना सिर्फ दिव्य शक्तियां थी बल्कि वह कई मायावी शक्तियों का भी स्वामी था। रावण त्रिकालदर्शी था। कहा जाता है कि उसे पहले से ही मालूम था कि धरती पर भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम का जन्म हो चुका है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनेंगे। लेकिन अहंकार में अंधा बन चुके रावण की इस अच्छाई पर पर्दा पड़ गया और वह माता सीता का हरण करने का अपराध कर बैठा।
परिजनों की रक्षा के लिए हमेशा तैयार :-
रावण में भले की हजार बुराईयां हो, लेकिन वह अपने परिवार का एक कुशल संचालक था। अपनी बहन शुर्पनखा के अपमान का बदला लेने के उद्देश्य से ही उसने मुख्य रूप से माता सीता का हरण किया था। माता सीता के स्वयंवर में पराजीत होने के बाद जब भगवान श्रीराम और माता सीता का विवाह हो गया तो रावण लंका वापस लौट गया था, उसने माता सीता पर उसके बाद नजर नहीं डाली थी। लेकिन अपनी बहन के उकसाने पर रावण ने सीताहरण करने का फैसला लिया।
कुशल शासक :-

बतौर राजा रावण एक सफल और अच्छा शासक था। उसने असंगठित राक्षश समाज को एकत्र किया और उनके कल्याण के लिए कई कार्य किये। उसके शासनकाल में लंका की जनता सुखी थी। राज्य की समृद्धि का पता इस बात से ही चलता है कि उस काल में लंका को सोने की लंका कही जाती थी। राज्य का हर नागरिक नियमों के अनुसार ही चलता था और किसी की भी अपराध करने की हिम्मत नहीं होती थी।
भेदभावरहित समाज की स्थापना :-
प्रसिद्ध उपन्यासकारों के अनुसार रावण की शिवभक्ति यमदेव और भगवान सूर्य तक को उसका प्रताप झेलने के लिए मजबूर कर देती थी। रावण एक प्रकांड विद्वान था, जो सभी जातियों का सम्मान करता था। कहा जाता है कि उसन बिना किसी भेद-भाव के सभी जातियों के लिए समान समाज की स्थापना करने का निर्णय भी ले लिया था। कहा जाता है कि रावण ने आर्यों की भोग-विलास वाली संस्कृति 'यक्ष' के स्थान पर सभी की रक्षा करने वाली 'रक्ष' संस्कृति की स्थापना की थी, जिसे मानने वाले ही राक्षश कहलाएं।
जब रावण भी बना दयालु :-
यूं तो राम-रावण के युद्ध में दोनों एक-दूसरे का प्राण लेने पर उतारू थे, लेकिन जब मेघनाथ का चलाया हुआ शक्तिवाण लक्ष्मण को लगा और वो मुर्छित होकर गिर पड़े। तब भगवान श्रीराम का विलाप सुनकर रावण का दिल भी पसीज गया था। यहीं वजह है कि जब जाम्वंत जी की सलाह पर हनुमान रावण के वैध सुषेण को लेने लंका में गये तो बिना किसी बाधा के वह सुषेण को वहां से लेकर आ सकें। वर्ना रावण का अपने राज्य पर इतना अधिक पकड़ था, कि उसकी अनुमति के बिना सुषेण को वहां से लाना मुश्किल होता। कहा जाता है कि सुषेण को ले जाकर लक्ष्मण का इलाज करवाने में रावण ने अपनी मौन सहमति दी थी।

रावण को अंधकार यानी बुराई और भगवान श्रीराम को अच्छाई यानी प्रकाश का प्रतीक माना जाता है। इसी वजह से दशहरा के दिन देशभर में रावण-कुम्भकर्ण-मेघनाथ का पुतला दहन किया जाता है।
चलिए जानते हैं किन शहरों में रावण-दहन सबसे ज्यादा मशहूर है।
1. दिल्ली :- दिल्ली के लालकिला मैदान में होने वाला रावण-दहन देश भर में सबसे ज्यादा मशहूर है। दिल्ली के प्रसिद्ध रामलीला मैदान में हफ्तों तक राम-लीला का मंचन भी किया जाता है। इसके बाद ही लंकापति रावण, उनके भाई कुम्भकर्ण और पुत्र मेघनाथ के पुतलों का दहन दशहरा के दिन किया जाता है।
2. अयोध्या :- रामजन्मभूमि अयोध्या में रावण का पुतला दहन बड़े ही धुमधाम से किया जाता है। अयोध्या में भी राम लीला के मंचन के बाद ही रावण का पुतला दहन किया जाता है। इस समय पूरा शहर मैदान में एकत्र होकर बुराई पर अच्छाई की जीत के साक्षी बनते हैं।
3. कोटा :- राजस्थान की कोचिंग नगरी कोटा के दशहरा मैदान में होने वाला रावण-दहन कार्यक्रम काफी ज्यादा फेमस है। यहां शानदार जुलूस के साथ भगवान श्री राम द्वारा रावण का वध करने का प्रतीक पुतला दहन संपन्न करवाया जाता है।

4. वाराणसी :- वाराणसी के गंगा घाट और राम-लीला का मंचन...कितना रोमांचक होता होगा ना वह दृश्य। जी हां, बनारस में भी राम-लीला का मंचन करने के बाद ही स्थानीय निवासी रावण का पुतला जलाते हैं। राम-लीला में भगवान राम के जीवन से जुड़ी विभिन्न घटनाओं का वर्णन किया जाता है।
5. जयपुर :- राजस्थान की राजधानी जयपुर में विद्याधर स्टेडियम रावण-दहन देखने के लिए बेस्ट जगह होती है। यहां ढोल-नगाड़ों और डांस परफॉर्मेंस के साथ रावण-दहन का आयोजन किया जाता है।
6. देहरादून :- देहरादून की परेड ग्राउंड में रावण-दहन का आयोजन किया जाता है। इसे देखने के लिए पूरा शहर जमा होता है। इस मौके पर कई तरह की एक्टिविटी भी होती हैं और खाने-पीने की पूरी व्यवस्था भी होती है।



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