सनातन संस्कृति में त्योहारों का बड़ा ही महत्व दिया गया है। ऐसे में कोई भी पर्व हो, सभी की अपनी-अपनी एक कहानी है। कुछ ऐसा ही है, दीवाली के 15 दिन बाद पड़ने वाला पर्व 'देव दीपावली'। यह पर्व यूं तो देश के सभी हिस्से के लिए काफी खास माना जाता है, लेकिन काशी के लिए इसका भव्यता कभी खत्म न होने वाली है। यह काशी के उन पर्व की तरह है, जिसे देखने और इसका लुत्फ उठाने के लिए विदेशों से पर्यटक आते हैं।
देवी-देवताओं की दीवाली
यह खास दिन इस बार 7 नवम्बर को पड़ रहा है, जो आज ही है। इस दिन काशी को दुल्हन की तरह सजाया जाता है। लाखों दीपों से जगमग काशी ऐसी प्रतीत होती है, जैसे मानिए कि खुद स्वर्ग धरती पर उतर आया हो। कहते हैं कि इस दिन देवी-देवता स्वर्ग लोक से उतरकर गंगास्नान करते हैं और दीप जलाकर काशी में दीपावली मनाते हैं, इसीलिए इस दिन को देव दीपावली के नाम से जानते हैं।

त्रिपुरासुर के वध के लिए मनाया जाता है देव दीपावली
हिंदू ग्रन्थों की मानें तो त्रिपुरासुर नामक एक दैत्य था, जिसके भय से न सिर्फ मानव जाति बल्कि देवी-देवता भी भय खाते हैं। ऐसे में भगवान शिव ने उसका वध किया और फिर सभी देवी-देवता प्रसन्न होकर काशी आए और खुशी के मारे यहां दीप प्रज्जवलित की। इसीलिए आज के दिन काशी में गंगा स्नान करने, पूजा-अर्चना करने व दान-पुण्य करने का बहुत महत्व है।

अद्भुत परम्परा का दर्शन
इस दिन काशी के सभी घाटों को दीपों से सजाया जाता है, जिसे देखने पर मानिए जैसे खुद देवगण पृथ्वी पर आकर ये सजावट कर रहे हों। इसके लिए हफ्ते भर पहले से ही तैयारियां शुरू कर दी जाती है। ऐसे में अगर काशी के इस अद्भुत परम्परा के दर्शन करना चाहते हैं तो आज के दिन वाराणसी जरूर पहुंचें या फिर अगर आप किसी कारणवश काशी नहीं पहुंच पा रहे हैं तो अगले साल के लिए प्लानिंग जरूर कर लें। यकीन मानिए ऐसा दिव्य नजारा आपने कहीं न देखा होगा।

वाराणसी कैसे पहुंचें
नजदीकी एयरपोर्ट - 30 किमी.
नजदीकी रेलवे स्टेशन - 8 किमी.
नजदीकी बस स्टेशन - 7.5 किमी.
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