पुचका/फुचका/पानी पुरी/गोलगप्पा/पानी के बताशे... नाम चाहे जितने भी हो, लेकिन एक बार नाम लेते ही लोगों के मुंह में पानी आना कॉमन बात है। पुचका एक ऐसी चीज है जिसे खाकर किसी का पेट तो नहीं भरता लेकिन मन जरूर भर जाता है। मन पूरी तरह से तुष्ट हो जाता है। इसी बात को ध्यान में रखकर दक्षिण कोलकाता के प्रसिद्ध दुर्गा पूजा कमेटी 'बेहला नूतन दल' ने इस साल दुर्गा पूजा पर अपने पंडाल को पानी पुरी से सजाने का फैसला लिया और थीम का नाम रखा 'तुष्टी'।

लेकिन यहीं थीम इस दुर्गा पूजा पंडाल के लिए नयी मुसीबत लेकर आ गयी है।
पिछले 3 महीनों की कड़ी मेहनत से धीरे-धीरे पूरे दुर्गा पूजा पंडाल को तैयार किया गया है। कहीं पुचका से प्रेरित पेंटिंग तो कहीं पुचका को पत्तों के दोने में सजाकर दुर्गा पूजा पंडाल को सजाया गया है। इसे सजाने का काम किया है सुदूर नीदरलैंड और एम्सटर्डम से आए दो युवा कलाकार बेंजामिन और मार्टियाना ने। साल 2021 में जब कोलकाता की दुर्गा पूजा को यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट में शामिल किया गया, तब दोनों को पता चला कि कोलकाता में 6-10 दिनों तक मनाया जाने वाला दुर्गा पूजा का त्योहार कितनी धुमधाम से मनाया जाता है।

कोलकाता आने के बाद जब उन्हें यहां के लोगों की पुचका के प्रति दिवानगी देखी तो उन्होंने भी इसे चखा और तब इसी थीम के आधार पर उन्होंने कोलकाता के शशीभूषण मुखर्जी रोड की दुर्गा पूजा जिसे बेहला नूतन दल के नाम से जाना जाता है, को सजाने का फैसला लिया। दुर्गा पूजा पंडाल पूरी तरह से तैयार होने के बाद जब उसे आम लोगों के लिए खोल दिया गया तब तक पूजा आयोजकों को नहीं पता थी कि उनके लिए कौन सी मुसीबत इंतजार कर रही है। दरअसल, जैसे ही आम लोगों के लिए पूजा पंडाल को खोला गया उसके बाद से ही सजावट में इस्तेमाल पुचका धीरे-धीरे गायब होने लगे। दूसरे पूजा पंडालों की तरह ही यहां भी निर्देशिका जरूर चिपकायी गयी है 'किसी भी वस्तु को हाथ ना लगाएं'।

लेकिन लोग कहां मानने वाले हैं। यहां आने वाले दर्शकों को जैसे ही सामने पंडाल की दिवारों पर पुचका दिख रहा है, वे उसे निकल ले रहे हैं। इस बात की जानकारी पूजा आयोजकों को तृतिया के दिन ही चल गयी थी। (बता दें, कोलकाता में लोग एकम् से ही घूमने के लिए निकल पड़े हैं।) पूजा आयोजकों ने फैसला लिया कि सिर्फ स्वच्छासेवक ही नहीं बल्कि पूजा पंडाल में तैनात सुरक्षाकर्मी भी लोगों से पुचका नहीं खोलने का अनुरोध करेंगे और वे कर भी रहे हैं, लेकिन लोग मानने को कहां तैयार हैं।
क्या है सबसे बड़ा खतरा?

दुर्गा पूजा पंडाल को सजाने के लिए असली पुचका का ही इस्तेमाल किया गया है, लेकिन पुचका में इमली का खट्टा पानी या आलू नहीं डाला गया है। पर उससे क्या फर्क पड़ता है। जैसे ही सामने पुचका दिख रहा है, लोग उसे पंडाल की दिवार से खोल ले रहे हैं। मगर पूजा आयोजकों को सबसे बड़ा डर इस बात का लग रहा है कि इन पुचकाओं को अगर किसी ने खा लिया तो उसकी तबीयत बिगड़ सकती है।
दरअसल, कोलकाता में 10 दिनों से अधिक समय तक दुर्गा पूजा उत्सव को मनाया जाता है। इतने लंबे समय तक इन पुचकाओं को ताजा बनाए रखने के लिए इनपर रसायन का लेप लगाया गया है। अगर किसी ने इन पुचकाओं को खाया तो उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाने की नौबत भी आ सकती है। हालांकि राहत की बात है कि अभी तक इन पुचकाओं के खाने से किसी भी व्यक्ति के बीमार होने की खबर नहीं मिली है।

पिछले कुछ दिनों में कई दर्शक पंडाल से पुचका खोलते हुए रंगे हाथों भी पकड़े गये हैं। इसके बावजूद पूजा पंडाल की मुसीबत कम नहीं हो रही है। आयोजकों का कहना है कि पंडाल में नीचे की तरफ जितने पुचका लगाए गये थे, उनमें से 70% पुचका दर्शकों ने खोल लिया है। इस बारे में बेहला नूतन दल दुर्गा पूजा कमेटी के सदस्य देवव्रत मुखर्जी ने मीडिया से कहा, "यह सच है कि दुर्गा पूजा पंडाल में जितने दर्शक आ रहे हैं, उनमें से कई पुचका निकाल ले रहे हैं।
हमारी तरफ से कई अनुरोध भी किये जा रहे हैं लेकिन वे मानने को तैयार ही नहीं हैं। जो लोग मां दुर्गा के दर्शन के लिए आ रहे हैं, उनसे बुरा बर्ताव भी तो नहीं किया जा सकता है। हम उन्हें सिर्फ समझाने का प्रयास ही कर सकते हैं।"



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