कोलकाता में दुर्गा पूजा सिर्फ शक्ति की आराधना ही नहीं है बल्कि यह इस शहर के इतिहास का एक हिस्सा है। कोलकाता में कई ऐसे परिवार ऐसे हैं जहां पिछले कई सौ सालों से दुर्गा पूजा का आयोजन किया जाता रहा है। ऐसा ही एक जमींदार परिवार है, रानी राशमणी का परिवार। जी हां, यह वहीं रानी राशमणी हैं, जिन्होंने कोलकाता के विख्यात दक्षिणेश्वर काली मंदिर की स्थापना की थी।

आज हम रानी राशमणी के ससुराल में होने वाली 233 साल पुरानी दुर्गा पूजा में घटी एक अनोखी घटना के बारे में आपको बताने वाले हैं।
कोलकाता की दूसरी सबसे प्राचिन दुर्गा पूजा
वर्तमान 13 नंबर, रानी राशमणी रोड (पूर्व में 71, फ्री स्कूल स्ट्रीट) में स्थित जमींदारों की इस हवेली में दुर्गा पूजा की सबसे पहले शुरुआत वर्ष 1790 में बाबु प्रीति राम माड़ ने की थी। वह रिश्ते में रानी राशमणी के ससुर लगते थे। पूजा शुरू होने के कई साल बाद इसी परिवार में रानी राशमणी बहू बनकर आयी, जब वह महज 11 साल की थी। उत्तर कोलकाता के सबसे लोकप्रिय दुर्गा पूजा 'शोभाबाजार राजबाड़ी' के बाद कोलकाता का यह सबसे प्राचिन दुर्गा पूजा है।
ऐतिहासिक है यह हवेली

हम जिस हवेली की बात कर रहे हैं, सिर्फ दुर्गा पूजा ही नहीं बल्कि इसी हवेली में कई ऐतिहासिक फैसले भी लिये गये हैं। यहीं वह हवेली है, जहां ईश्वरचंद्र विद्यासागर और रानी राशमणी ने बैठकर विधवा विवाह से संबंधित नियमों को निर्धारित किया था। वर्ष 1851 में हुई इस बैठक में ही फैसला लिया गया था कि विधवा महिलाओं को समाज की मुख्य धारा से कैसे जोड़ा जाएगा? विधवा विवाह से संबंधित किन कानूनों का पालन करना होगा? इत्यादि। यह बैठक संगमरमर की जिस गोल टेबल पर हुई थी वह टेबल अभी भी इस हवेली में सुरक्षित रखी हुई है।

इतना ही नहीं, कोलकाता में हर साल आयोजित होने वाली कोलकाता विंटेज कार रैली में इस परिवार की 4 गाड़ियां हिस्सा लेती है। इसी हवेली के गैराज में रहती है भारत की एकलौती 'हिलमैन सुपर इम्प'। ब्रिटिशकालीन इस गाड़ी का दूसरा कोई जोड़ीदार भारत में नहीं है।
दो शतकों में कभी बंद नहीं हुई दुर्गा पूजा
इस परिवार या यूं कहे जमींदार हवेली में पिछले लगभग 233 सालों से दुर्गा पूजा का आयोजन किया जा रहा है। लेकिन इतने सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ है कि किसी भी कारण से इस परिवार में दुर्गा पूजा नहीं की गयी हो। रानी राशमणी की शादी के बाद से लेकर उनकी मृत्यु यानी वर्ष 1861 तक, उनके ससुराल में दक्षिणेश्वर मंदिर के पुजारी रामकृष्ण परमहंस ने आकर 2 बार पूजा की थी। बता दें, रामकृष्ण परमहंस की गिनती बंगाल के महान संतों में होती है। दक्षिणेश्वर में भवतारिणी देवी काली की प्रतिमा की स्थापना रामकृष्ण परमहंस के बड़े भाई रामकुमार चट्टोपाध्याय के हाथो हुई थी।

दावा किया जाता है कि देवी काली रामकृष्ण परमहंस से मिलने आती थी। इतना ही नहीं वह उनके हाथों से मंदिर में चढ़ाया गया भोग भी ग्रहण किया करती थी। रानी राशमणी द्वारा स्थापित मंदिर के मुख्य पुजारी होने के कारण उनके ससुराल के साथ रामकृष्ण परमहंस के काफी अच्छे संबंध थे। वर्ष 1864 में जब रामकृष्ण परमहंस इस हवेली में दुर्गा पूजा करवाने आए तो उन्होंने महिलाओं के परिधान में देवी दुर्गा की पूजा की थी। हालांकि उस समय काफी लोगों ने इसका विरोध भी किया था लेकिन रामकृष्ण परमहंस ने तब इसकी व्याख्या करते हुए कहा था कि उन्होंने देवी दुर्गा की सखी के रूप में उनकी पूजा की है।
होती है 3 दिन कुमारी पूजा
आमतौर पर दुर्गा पूजा के दौरान सभी स्थानों पर सिर्फ नवमी के दिन ही कुमारी कन्याओं को देवी के रूप में पूजा करने का प्रचलन है। लेकिन रानी राशमणी ने अपने ससुराल में आयोजित होने वाली इस पूजा में 3 दिन कुमारी पूजा करने का प्रचलन शुरू किया था, जो आज भी जारी है। संभवतः यह कोलकाता की एकमात्र दुर्गा पूजा है जहां सप्तमी, अष्टमी और नवमी के दिन कुमारी पूजा की जाती है। 1790 से लेकर वर्ष 1960 तक यहां हर वर्ष 40 मन चावल से बना नैवैद्य देवी दुर्गा को अर्पित किया जाता था।

लेकिन 60 के दशक में जब महामारी फैली और अकाल पड़ा, उस समय से यहां सिर्फ 1 मन चावल से बना नैवैद्य ही मां दुर्गा को अर्पण किया जाता है। पहले इस दुर्गा पूजा में पशुओं की बलि दी जाती थी, जिसमें भैंस और 7 बकरियां होती थी। लेकिन 2003 से यहां पशुओं की बलि पूरी तरह से बंद कर दी गयी है। इस परिवार में देवी दुर्गा पूजा और मूर्ति का निर्माण कुल पुरोहित व मूर्तिकार की छठवीं पीढ़ी के सदस्य कर रहे हैं।



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