उत्तर प्रदेश हो या गुजरात, महाराष्ट्र हो या मध्य प्रदेश या फिर दिलवालों की दिल्ली...हर जगह नवरात्रि की धुम मची रहती है। साल में 9 दिन ऐसे होते हैं, जब लोग हर रोज देवी मां के 9 रूपों की पूजा करते हैं। लेकिन इन सबसे अलग पश्चिम बंगाल एकमात्र ऐसा राज्य होता है जहां नवरात्रि नहीं बल्कि दुर्गा पूजा मनायी जाती है।

यूं तो यह त्योहार 10 दिनों से भी लंबा चलता है लेकिन परंपरागत रूप से कोलकाता में दुर्गा पूजा सिर्फ 5 दिनों की होती है। खास बात यह है कि समाज से पूरी तरह से कटी और अपवित्र मानी जाने वाली वेश्याओं का दुर्गा पूजा में विशेष योगदान होता है। दरअसल, देवी दूर्गा की कोई भी प्रतिमा तब तक संपूर्ण नहीं मानी जाती है जब तक उसकी मिट्टी में किसी कोठे या वेश्यालय की मिट्टी ना मिलायी जाए।
आपको बताते हैं देश के बाकी हिस्सों से कितनी अलग होती है कोलकाता की दुर्गा पूजा :
नवरात्रि नहीं दुर्गा पूजा

देशभर में 9 दिनों तक नवरात्रि मनाया जाता है। लेकिन पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा सिर्फ 5 दिनों के लिए होती है। पंचमी से लेकर विजयादशमी (जिसे स्थानीय लोग दशमी कहते हैं) तक ही मनाया जाता है। दशमी के दिन देवी दुर्गा समेत बाकी सभी देवी-देवताओं और उनके वाहनों का विसर्जन कर दिया जाता है। हाल के दिनों में दर्शकों की भीड़ अधिक होने की वजह से विजयादशमी के दिन केवल मंत्रों के द्वारा ही प्रतिमाओं का विसर्जन होता है। वास्तविक विसर्जन कुछ दिनों बाद किसी नदी या तालाब में किया जाता है।
मां नहीं, घर की बेटी होती है देवी दुर्गा

देश के बाकी सभी हिस्सों में नवरात्रि के दौरान देवी दुर्गा को मां के रूप में पूजा जाता है। यह ऐसा समय होता है जब देवी दुर्गा अपने भक्तों की परेशानियों को दूर और उनकी मनोकामनाओं को पूरी करती है। इस समय देवी मां को खुश करने के लिए भक्त व्रत और उपवास रखते हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल में देवी दुर्गा को मां नहीं बल्कि घर की बेटी के तौर पर पूजा जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार देवी दुर्गा कैलाश पर्वत, जो उनका ससुराल है, से 5 दिनों के लिए मायके आती है। इसी वजह से दुर्गा पूजा के दौरान पश्चिम बंगाल में उपवास नहीं बल्कि जमकर खाने-खिलाने का दौर चलता है, क्योंकि एक बार विदा होने के बाद बेटी दुर्गा फिर एक साल बाद ही मायके आ सकेगी।
कैलाश से साथ लाती है अपने बच्चे

त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) की तरह ही पार्वती (दुर्गा), लक्ष्मी और सरस्वती को त्रिदेवी के रूप में पूरी दुनिया पूजती है। लेकिन पश्चिम बंगाल की स्थानीय मान्यता के अनुसार सिर्फ गणेश और कार्तिकेय ही नहीं बल्कि लक्ष्मी और सरस्वती भी मां दुर्गा की संतानें हैं। कैलाश से मां दुर्गा जिस तरह धरती पर अपने मायके आती हैं, ठीक उसी तरह लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिकेय और गणेश कैलाश से अपने ननिहाल धरती पर आते हैं।
5 दिनों में होता है विशेष अनुष्ठानों का आयोजन

पश्चिम बंगाल में नवरात्रि के पंचमी से लेकर दशमी तक परंपरागत रूप से दुर्गा पूजा का आयोजन किया जाता है।
- पंचमी : चक्षुदान (देवी दुर्गा समेत बाकी सभी देवी-देवताओं की आंखे बनायी जाती है)।
- षष्ठी : खोला जाता है पट।
- सप्तमी : नव पत्रिका स्नान (पूजा पंडाल में भगवान गणेश के बगल में केला का पेड़ रखा जाता है, उसे अहले सुबह नदी में स्नान करवाकर नयी साड़ी पहनायी जाती है)
- अष्टमी : विशेष पुष्पांजलि। इसके बाद वह समय जब अष्टमी खत्म और नवमी शुरू होती है, उसे संधीक्षण कहा जाता है। इस समय विशेष पूजा और दीप प्रज्जवलन अनुष्ठान आयोजित होती है जिसे संधी पूजा कहा जाता है।
- नवमी : बलि (पुराने समय में पशुओं की बलि दी जाती थी, लेकिन अब फलों व सब्जियों की बलि चढ़ती है)
- दशमी : विसर्जन
सिन्दुर से खेली जाती है होली

दुर्गापूजा में हर दिन आप भले ही पुराने कपड़े पहनकर घूमें लेकिन किसी भी बंगाली परिवार का सदस्य अष्टमी के दिन जो भी परिधान पहनता है वह नया ही होता है। दशमी को जब मंत्रोच्चारण के साथ दुर्गा मां व अन्य देवी-देवताओं के प्रतिमाओं को विसर्जित किया जाता है, उसके बाद विवाहित महिलाएं पंडाल में देवी दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी को सिन्दुर लगाती और मिठाई खिलाकर उन्हें विदा करती हैं। इसके बाद महिलाएं एक-दूसरे के माथे और गाल पर सिन्दुर लगाकर दुर्गा पूजा की शुभकामनाएं देती हैं।
सिर्फ देवी लक्ष्मी रुकती हैं धरती पर

मान्यता के अनुसार हर उस पंडाल में या स्थान पर जहां दुर्गा पूजा होती है, वहां शरद पूर्णिमा के दिन लक्ष्मी पूजा, जिसे कोजागरी लक्ष्मी पूजा कहा जाता है, करने का प्रावधान है। इसलिए कहा जाता है कि दशमी के बाद देवी दुर्गा जब अपने बच्चों के साथ कैलाश वापस लौटती हैं, तब उनके साथ कार्तिकेय, गणेश और देवी सरस्वती ही होती हैं। देवी लक्ष्मी, कोजागरी लक्ष्मी पूजा के बाद कैलाश वापस लौटती हैं।
बता दें, हर साल देवी दुर्गा का आगमन और प्रस्थान किसी ना किसी वाहन पर होता है। साल 2023 में देवी दुर्गा का घोटक (घोड़ा) पर आगमन और प्रस्थान दोनों होने वाला है। 2022 में देवी दुर्गा गज (हाथी) पर आयी थी और उनका गमन नौका पर हुआ था।



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