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Independence Day Special : Then And Now - लखनऊ के कई प्रसिद्ध स्मारक

स्वतंत्रता दिवस पर आजादी का जश्न मनाने के साथ-साथ हम अपने देश की उन सभी ऐतिहासिक धरोहरों के बारे में भी एक बार फिर से जानते-समझते हैं जिनकी आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिक रही है। इसी क्रम में आज हम बात करने वाले हैं उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के उन ऐतिहासिक स्मारकों और धरोहरों के बारे में बात करने वाले हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपनी महत्वपूर्ण जगह बनायी थी।

जी हां, हम बात करने वाले हैं लखनऊ के उन स्मारकों की, जिनका निर्माण वर्ष 1947 से पहले किया गया था। नवाबों के इस शहर में इन ऐतिहासिक इमारतों का निर्माण तो किसी और काम या मकसद से किया गया था लेकिन अब इनका इस्तेमाल किसी और काम किया जाता है।

bara imambara lucknow

आइए जान लेते हैं ऐसे इमारतों के बारे में :

1. बड़ा इमामबाड़ा

Then - वर्ष 1784 में बड़ा इमामबाड़ा का निर्माण अवध के नवाब असफुद्दीन दौला ने करवाया था। इस शानदार मस्जिद का निर्माण 1780 में शुरू हुआ था। जो करीब 1 दशक तक इस क्षेत्र के बेरोजगार नौजवानों के लिए रोजगार का जरिया बना रहा। कहा जाता है कि इसके निर्माण में दिन के वक्त आम लोग इसका जितना निर्माण करते थे, उच्च स्तर के राजमिस्त्री रात को उस निर्माण को ढहा दिया करते थे। कहा जाता है कि बड़ा इमामबाड़ा का मुख्य हॉल दुनिया का सबसे विशाल हॉल है, जिसमें समर्थन देने के लिए कोई बीम नहीं है।
Now - बड़ा इमामबाड़ा आज लखनऊ के सबसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में एक है। यहां का सबसे बड़ा आकर्षण भूल-भुलैया है, जिसमें खोने के लिए हर पर्यटक तैयार रहता है। इसके साथ ही बड़ा इमामबाड़ा की वास्तुकला भी बड़ी संख्या में पर्यटकों को यहां आने के लिए आकर्षित करती है।

2. छोटा इमामबाड़ा

Then - अवध के नवाब मोहम्मद अली शाह ने वर्ष 1838 में छोटा इमामबाड़ा का निर्माण करवाया था। बताया जाता है कि इसके निर्माण में करीब 54 सालों का वक्त लग गया था। छोटा इमामबाड़ा के अंदर ही नवाब और उनकी मां की कब्र भी है। इस पूरे इमारत की सजावट के लिए जिन झूमर और सामानों का इस्तेमाल किया गया है, उन्हें बेल्जियम से मंगवाया गया था।
Now - छोटा इमामबाड़ा भी पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण है। मुहर्रम जैसे मौकों पर इसे बहुत ही सुन्दर तरीके से सजाया जाता है। छोटा इमामबाड़ा की सजावट और वास्तुकला को देखकर ही समझ में आता है कि नवाबी समयकाल कितना शानदार रहा होगा।

rumi darwaza lucknow

3. रूमी दरवाजा

Then - वर्ष 1784 में रूमी दरवाजा का निर्माण अवध के नवाब असफुद्दीन दौला ने 1784 में करवाया था। लखनऊ का ऐतिहासिक रूमी दरवाजा अवधी वास्तुकला का एक शानदार उदाहरण है। रूमी दरवाजा वास्तव में महल का प्रवेश द्वार था, जिसे 1857 की क्रांति के दौरान ब्रिटिश हुकूमत ने गिरा दिया। इसे पुराने लखनऊ के प्रवेश द्वार के तौर पर देखा जाता है।
Now - महल को भले ही गिरा दिया गया हो लेकिन रूमी दरवाजा और इसी वास्तुकला आज भी लोगों को आकर्षित करती है। लखनऊ आने वाले पर्यटक इस रास्ते से होकर जब भी गुजरते हैं, इस 60 फीट ऊंचे विशाल दरवाजे जिसे 'तुर्की गेट' भी कहा जाता है, की सुन्दरता में खो जाते हैं। यहां अक्सर लोग फोटोग्राफी करने के लिए भी आते हैं।

4. ब्रिटिश रेसीडेंसी

Then - 18वीं सदी में ब्रिटिश अधिकारियों के निवास स्थान के रूप में ब्रिटिश रेसीडेंसी का निर्माण किया गया थआ। 1857 की क्रांति के समय ब्रिटिश रेसीडेंसी एक बेहद महत्वपूर्ण लोकेशन था, जो लखनऊ की घेराबंदी का केंद्र बिन्दु था।
Now - आज ब्रिटिश रेसीडेंसी खंडहर में तब्दील हो चुका है और इसे बतौर ऐतिहासिक स्थान सुरक्षित रखा गया है। यहां एक म्यूजियम भी है जहां 1857 की क्रांति से जुड़े कई महत्वपूर्ण निशानियां देखने को मिलती हैं।

5. दिलखुश कोठी

Then - 19वीं सदी के शुरुआत में दिलखुश कोठी का निर्माण मेजर गोर ऑस्ले द्वारा अवध के नवाबों के लिए किया गया था। इस कोठी का निर्माण ब्रिटिश वास्तुकला के आधार पर इंग्लिश बैरक के तर्ज पर किया गया था।
Now - आज दिलखुश कोठी पर्यटकों का प्रमुख आकर्षण है। लेकिन अब दिलखुश कोठी के खंडहर ही शेष बचे हैं, जो अतीत में इसकी समृद्धि की कहानियां सुनाते हैं। लखनऊ आने वाले पर्यटक दिलखुश कोठी में घूमे बगैर वापस नहीं जाते हैं।

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