होली का त्योहार खत्म हो चुका है लेकिन खुमार उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है। देश के अलग-अलग हिस्सों में 14 और 15 मार्च को जमकर होली का त्योहार मनाया गया। गीले रंग, सूखे गुलाल से लेकर बरसाना और मथुरा की फूलों वाली, लट्ठमार और लड्डूमार होली। अगर होली पर रंग व गुलाल खेलकर अभी भी आपका मन नहीं भरा है तो क्यों न कानपुर का रुख किया जाए।
मथुरा-बरसाना या गोकुल आदि शहरों में होली से करीब 15-20 दिनों पहले इस उत्सव को मनाना शुरू कर दिया जाता है। लेकिन कानपुर पूरे देश में संभवतः एकलौता ऐसा शहर है जहां होली के एक सप्ताह बाद तक उत्सव मनाया जाता है। कानपुर में होली के बाद मनाए जाने वाले इस उत्सव को कहा जाता है - गंगा मेला।

क्या है कानपुर का गंगा मेला और इसका इतिहास
Republic World की मीडिया रिपोर्ट से मिली जानकारी गंगा मेला की शुरुआत 82 साल पहले वर्ष 1942 में हुई थी। लोग गंगा नदी के किनारे जमा होते हैं और एक-दूसरे पर रंग डालते हैं। कानपुर की होली 1942 के स्वतंत्रता संग्राम और उससे जुड़ी कहानियों को दर्शाता है।
बताया जाता है कि 1942 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों ने 45 स्वाधीनता संग्रामियों को गिरफ्तार किया था, जिसमें गुलाब चंद्र सेठ, बुधुलाल मेहरोत्रा, नवीन शर्मा, विश्वनाथ टंडन, हमीन खान और गिरीधर शर्मा आदि शामिल थे। अंग्रेजों की काफी कोशिशों के बावजूद किसी और स्वतंत्रता संग्रामी के बारे में पता नहीं चल सका था।
इन लोगों की गिरफ्तारी के विरोध में कानपुर के पूरे मार्केट को बंद रखा गया था, जिसका समर्थन स्थानीय लोगों, व्यापारियों, कर्मचारियों और लेखकों ने संयुक्त रूप से किया था और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अभियान चलाया था।
होली से 5वें दिन, जिसे अनुराधा नक्षत्र के रूप में जाना जाता है, उस दिन सभी गिरफ्तार स्वतंत्रता संग्रामियों को छोड़ दिया गया था। स्वाधीनता संग्रामियों की अंग्रेजी हिरासत से मुक्ति की खुशी में लोगों ने अपने चेहरों को चटकदार रंगों से रंग लिया था जिसे अंग्रेजों पर एक ऐतिहासिक जीत के रूप में मनाया गया था।

कैसे मनाया जाता है गंगा मेला?
कानपुर का गंगा मेला स्वतंत्रता संग्राम के साथ जुड़ा हुआ है। इसे करीब 1 सप्ताह तक मनाया जाता है। गंगा मेला के दिन चटकदार रंगों से गाड़ियों, ऊंट आदि को सजाकर जुलूस निकाला जाता है। जुलूस की शुरुआत हाटिया मार्केट से होती है, जो कानपुर की लगभग 1 दर्जन से अधिक जगहों से होकर गुजरता है।
नयागंज, चौक सर्राफा आदि जगहों से होते हुए यह जुलूस दोपहर के करीब 2 बजे हाटिया के रज्जन बाबु पार्क में जाकर खत्म होता है। बाद में शाम को गंगा मेला सरसैया घाट पर लगता है, जिसमें पूरे कानपुर से लोग जुटते हैं और एक दूसरे को होली की बधाईयां देते हैं। इस साल गंगा मेला 20 मार्च को लगेगा।



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