जम्मु-कश्मीर अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के कारण दुनिया भर में प्रसिद्ध है। पिछले कुछ समय से कश्मीर घूमने जाने वाले पर्यटकों की तादाद में भी काफी वृद्धी हुई है। इस राज्य के हर एक कोने को प्रकृति ने नायाब सुन्दरता से नवाजा हुआ है। इसके साथ ही यहां कई ऐतिहासिक संरचनाएं भी हैं, जो आज लोगों के लिए किसी पर्यटन स्थल से कम नहीं है।

कश्मीर का ऐसा ही एक पर्यटन स्थल है गांदरबल जिले में स्थित नारानाग मंदिर समूह। इस मंदिर समूह को शोडरतीर्थ, नंदीक्षेत्र व भूतेश्वर के नाम से भी जाना जाता है।
आइए आपको नारानाग मंदिर समूह के बारे में विस्तार से बताते हैं :
कई मंदिरों का समूह है यह मंदिर परिसर
नारानाग मंदिर परिसर में सिर्फ एक नहीं बल्कि यह कई मंदिरों का समूह है। इस मंदिर परिसर के पश्चिमी भाग में समूह में करीब 6 मंदिर हैं, जिसे शिव-ज्येष्ठ के नाम से जाना जाता है। वहीं पूर्वी भाग में भी कई मंदिरों का निर्माण दूसरे समूह में किया हुआ है। इन सबसे बीच मुख्य मंदिर स्थित है, जो भगवान शिव को समर्पित है। हालांकि इस मंदिर परिसर के अधिकांश मंदिरों की स्थिति ही रख-रखाव के अभाव में जीर्ण-शीर्ण हो गयी है। यह मंदिर परिसर अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिन है, जो कश्मीर के इस प्राचीन धरोहर की अब रक्षा करते हैं। इन मंदिरों की स्थिति आज भले ही खराब हो गयी हो लेकिन इन्हें देखते ही इनकी भव्यता का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।
कहां है नारानाग मंदिर

श्रीनगर-सोनमर्ग मार्ग पर श्रीनगर से लगभग 50 किमी आगे बढ़ने पर गांदरबल जिले में कंगल क्षेत्र के अंतर्गत नारानाग गांव आता है। वांगथ नदी के किनारे बसा यह गांव प्राकृतिक सुन्दरता का धनी है। प्राकृतिक घास के मैदानों, झीलों, पहाड़ों और हरमुख पर्वत से घिरा यह स्थान गंगाबल झील की ट्रेकिंग का बेस कैंप भी है। इसके अलावा पीर पंजाल श्रेणी के कई अन्य ट्रेकिंग स्थलों का बेस कैंप भी इस क्षेत्र के आसपास ही है। ट्रेकरों को ग्राफी कई जरूरी सुविधाएं भी मुहैया करवाते हैं।
नारानाग मंदिर का इतिहास
आर्कियोलॉजीकल विभाग के अनुसार नारानाग गांव का प्राचीन नाम सोदरतीर्थ था, जो उस समय के तीर्थयात्रा स्थलों में से एक प्रमुख नाम है। बताया जाता है कि मंदिरों के इस समूह का निर्माण 7वीं-8वीं शताब्दी में राजा ललितादित्य के राजकाल में करवाया गया था। हालांकि कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इस मंदिर का अस्तित्व कर्कोटा वंश के राजा ललितादित्य मुक्तिपिदा के शासनकाल से भी पहले था।

उन्होंने इन परिसरों को विकसित करने के लिए बड़ी मात्रा में धन दान में दिया था और मंदिर परिसर में एक मंदिर का निर्माण करवाया था जिसे शिव ज्येष्ठेश को समर्पित किया गया था। इस मंदिर में 8वीं शताब्दी में राजा अवन्तिवर्मन ने भगवान भूतेश्वर की मूर्ति के स्नान के लिए एक पत्थर की चौकी और चांदी की नाली का निर्माण करवाया था।
नारानाग का क्या होता है अर्थ
नारानाग शब्द मूल रूप से 'नारायण नाग' शब्दों से मिलकर बना है। इसमें से 'नाग' शब्द कश्मीरी है, जिसका अर्थ चश्मा होता है। यह चश्मा आंखों पर लगाने वाला चश्मा नहीं होता है बल्कि पानी का चश्मा है। कश्मीर में चश्मा उन क्षेत्रों को कहते हैं जहां जमीन पर मौजूद दरारों से जमीन के नीचे से पानी खुद ही बाहर आता रहता है।
नारानाग मंदिर के ठीक सामने पत्थर से बना जल संजय का पात्र है, जिसका प्रयोग संभवतः धार्मिक कार्यों के लिए किया जाता था। इसके अलावा मंदिर में भगवान पर चढ़ाए गये जल की निकासी के लिए नालियों की स्पष्ट बनावट भी नजर आती है। मंदिर के उत्तर पश्चिम भाग में एक प्राचीन कुंड भी बना हुआ है। पत्थरों से बनी मंदिर की चहारदीवारी पर अभी भी कलाकृतियों के अवशेष दिखाई देते हैं।



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