वह भी एक समय था जब हमारी माँ हमें खाना खिलाने के लिए चिड़ियों को दिखा कर फुसलाती थी। घर में आए हुए छोटे से चिड़िया को भी बाहर निकालने का खेल खेलकर हम खूब खुश हुआ करते थे। अब लोग तकनीक में इतने व्यस्त हो गये हैं की वो फोन पर ही गुस्से वाली चिड़िया(ऐंगरी बर्ड) के साथ खेलने लगे हैं। यहाँ तक कि लोग असली चिड़ियाओं को उनके तकनीक के बीच आने वाली बाधा समझने लगे हैं। यह बड़े ही दुख की बात है की हम उन्हें उनकी ही धरती पर रहने नहीं दे रहे हैं। और यह सब सिर्फ़ लोगों की बढ़ती तकनीक की वजह से, मोबाइल टावर्स की वजह से।यहाँ तक कि कौए भी आज के आम दिनों में देखने को बहुत कम मिलते हैं।

खिचान की एक हवेली
Image Courtesy: Govinda rajpurohit
ऐसे समय में भी जोधपुर के अंदरूनी हिस्से में एक गाँव है, खिचान जहाँ की धरती में बाहरी देश के पक्षियों का स्वागत होता है। यह सब कुछ सालों पहले ही शुरू हुआ है, जहाँ रतनलाल मालू नाम के आदमी ने सबसे पहले वहाँ के कबूतरों को खाना खिलाना आरंभ किया। जैसे ही उसने पक्षियों के लिए अनाज डालना शुरू किया, पक्षियों और गिलहरियों के कई झूण्डों ने भी वहाँ आना शुरू कर दिया। दिलचस्प बात यह है कि सारस की एक अनोखी प्रजाति, कूंजों के झूण्डों ने भी दाना चुगने के लिए वहाँ आना शुरू कर दिया। तब से यहाँ पलायन कर चुके कूंजों की संख्या भी बढ़ गयी है।

सारसों का झुंड
Image Courtesy: Chinmayisk
कूंज कौन या क्या हैं?
कूंज सारस परिवार की ही एक छोटी सी जाति का समूह है। यह मुख्य रूप से यूरेशिया, चीन और मंगोलिया देशों से होते हैं। ये पक्षी ठंड के मौसम में अफ्रीका और भारत के राजस्थान की धरती को पलायन करते हैं। ये घास के मैदानों, मरुस्थली भूमि और पानी के पास ही रहते हैं। कूंज सारस की अन्य प्रजातियों के मुक़ाबले आकर में छोटे होते हैं। इनके सर से शरीर के नीचे का भाग काले रंग का होता है और शरीर के उपर का भाग ख़ासकर के पंख सफेद रंग के।

चुरु में कूंजों का एक जोड़ा
Image Courtesy: Sumeet Moghe
खिचान गाँव में चिड़ियों को अनाज खिलाने का कार्य जो छोटे पैमाने पर शुरू हुआ था, साल दर साल बढ़ता जा रहा है। ऐसा लगता है की कूंजों को वहाँ के पर्यावरण और इनके लिए होने वाली वहाँ की मेहमानवाज़ी से उनको प्यार है। इसलिए हर साल अगस्त महीने के अंतिम दिनों से ही कूंज इस धरती में अनाज खाने के लिए आना शुरू कर देते हैं। रेकॉर्ड्स के मुताबिक हर साल यहाँ लगभग 9000 कूंज ठंड में पलायन करते हैं।

सारस दाना चुगने के बाद उड़ जाते हैं
Image Courtesy: Travelling Slacker
इस कार्य में सबसे बड़ा हाथ है, यहाँ के गाँववालों का जिन्होंने इस भूमि को बनाया है खास उनके लिए। आज के समय में लगभग 5 क्विंटल तक के अनाज इस धरती पर डाले जाते हैं, इन पक्षियों के लिए। ये सारस अपने खाना खाने के समय में बिल्कुल सही समय पर यहाँ पहुँच जाते हैं। इस वजह से पक्षियों की यहाँ काफ़ी भीड़ इकट्ठा हो जाती है। ऐसे में कई पक्षियों के झुंड इंतज़ार करते हैं कुछ पक्षियों के चले जाने का जिससे की वे आराम से अपना दाना चुग सकें।

एक साथ उड़ते सारस
Image Courtesy: Francis Bacon
खिचान जाने का सबसे सही समय
खिचान एक मरुस्थली क्षेत्र है, इसलिए पर्यटक यहाँ सिर्फ़ प्रवासी मौसम में आते हैं। सारस यहाँ अगस्त महीने के अंतिम दिनों में आना शुरू करते हैं और फ़रवरी के महीने में लौट जाते हैं। नवंबर से फ़रवरी का महीना खिचान में पक्षियों के इन झूण्डों का दीदार करने का सबसे सही समय होता है।
दुर्भाग्य की बात यह है कि, अन्य मानव बस्तियों की तरह खिचान में भी विकास के नकारात्मक चिन्ह दिखने लगे हैं। कुछ लोग इन सारसों के लिए दाना डालने के इस कार्य को अनुचित ठहरा रहे हैं। लेकिन कई विदेशी संगठनों ने इनके प्रति अपने काम को पहचाना है और इनके लिए कार्य आसंभ किया है, जिससे के खिचान अभी भी राजस्थान में कूंजों का गाँव होने के लिए प्रसिद्ध है।

हज़ारों की संख्या में कूंजों का झुंड
Image Courtesy: ANKITNARANG297
अगर आप इन पक्षियों को देखने के लिए उत्सुक हैं, तो यहाँ की यात्रा के लिए तैयार हो जाइए जहाँ आपको कूंजों(क़ूराज) जिन्होंने इस गाँव को अपना दूसरा घर बना लिया है, को देखने का अद्भुत नज़ारा मिलेगा और आप इनके सुंदरता के नज़ारे का मज़ा भी ले पाएँगे।
खिचान पहुँचें कैसे
खिचान जोधपुर से लगभग 150 किलोमीटर की दूरी पर है। फलोदी खिचान के समीप बसा सबसे नज़दीकी शहर है।
ट्रेन द्वारा: फलोदी रेलवे स्टेशन राजस्थान के मुख्य रेलवे स्टेशनों जोधपुर और जैसलमेर से आराम से पहुँचा जा सकता है।
बस द्वारा: बीकानेर, जैसलमेर और जोधपुर से कई बसें फलोदी तक के लिए उपलब्ध हैं।
हवाई यात्रा द्वारा: जोधपुर हवाई अड्डा खिचान का सबसे नज़दीकी हवाई अड्डा है।
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