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क्या आप जानते हैं हिमाचल के मंडी का प्राचीन नाम क्या था, आइए नजर डालते हैं इतिहास के पन्नों पर

हिमाचल की खूबसूरती के बारे में जितनी तारीफ की जाए, उतनी कम है। आसान भाषा में कहा जाए तो हिमाचल को भारत के जन्नत के रूप में देखा जा सकता है। आज हम बात करने जा रहे हैं यहां के मंडी के बारे में, जिसका इतिहास जितना गहरा है उतनी ही ये खूबसूरत भी है। हालांकि, हिमाचल के सभी स्थान बेहद ही खूबसूरत है। खासतौर पर आप सभी का फेवरेट हिल स्टेशन मनाली, शिमला और सोलन का कसौलीचैल

मंडी के जगहों के बारे में बात की जाए तो यहां घूमने के लिए काफी अच्छी जगहें हैं। देवदार के पेड़ों और चाय के बागानों से घिरा ये शहर किसी को भी अपना दीवाना बना सकता है। इसे 'पहाड़ियों की वाराणसी', 'हिमाचल की काशी' या 'छोटी काशी' के नाम से भी जाना जाता है। छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध होने का मुख्य कारण है कि इस शहर में 81 मंदिरों का होना। इसके अलावा मंडी पूरे हिमाचल का वाणिज्यिक केंद्र भी माना जाता है। ब्यास नदी के तट पर स्थित अपने पुराने महलों और औपनिवेशिक वास्तुकला के लिए भी जाना जाता है।

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मंडी का इतिहास

हिमाचल के इस खूबसूरत नगीने की बात की जाए तो इसका इतिहास करीब 1300 साल पुराना है। इस शहर का प्राचीन नाम मांडव नगर और तिब्बती नाम जहोर है। इस शहर को हिमाचल का धार्मिक व सांस्कृतिक केंद्र भी माना जाता है। कहा जाता है कि महान संत मांडव ने ब्यास नदी के किनारे पर स्थित कोल्सरा नामक पत्थर पर बैठकर तपस्‍या की थी, उनके पास कई अलौकिक शक्तियां थी और उनके पास अनेक ग्रन्‍थों का ज्ञान भी था। उन्हीं के नाम पर इस शहर का नाम मांडव नगर पड़ा था, जो बाद में मंडी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

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सुकेत और मंडी से मिलकर बना है मंडी शहर

मंडी जिला मुख्यत: दो रियासतों (सुकेत और मंडी) से मिलकर बना है। सुकेत रियासत की स्थापना 765 ईस्वी में वीरसेन ने की थी। कनिंघम के अनुसार, वीरसेन बंगाल से आया था। जब वह यहां आया तब यह क्षेत्र छोटे-छोटे ठाकुरों व राणाओं में बंटा हुआ था, जिसे धीरे-धीरे परास्त कर पूरा क्षेत्र अपने कब्जे में कर यहां उसने दो किलों (काजुन और मागरा) का निर्माण भी करवाया। इसके अलावा उसने चाबासी, वीरकोट और वीरा किले का भी निर्माण करवाया। इस दौरान उसने कुल्लू के राजा को परास्त कर बंदी बना लिया था। वहीं, मंडी रियासत की स्थापना सुकेत राजवंश के ही राजा बाहुसेन ने 1000 ईस्वी में की थी।

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सुकेत रियासत का इतिहास

सुकेत रियासत ने मंडी पर 765 ईस्वी से लेकर 1948 ईस्वी तक राज किया और फिर एक स्वतंत्र जिले की स्थापना की गई, जो वर्तमान समय में मंडी के नाम से जाना जाता है। सुकेत का प्राचीन नाम शुक क्षेत्र या शुक खेत था, जो धीरे-धीरे सुकेत में तब्दील हो गया। कहा जाता है कि इस स्थान पर एक सुखदेव नाम के महात्मा रहा करते थे, जिनके नाम पर ही इस स्थान का नाम पड़ा। इस रियासत की नींव वीरसेन ने डाली थी, जो इस रियासत का प्रथम राजा भी कहलाया। फिर 1240 ईस्वी में मदनसेन ने गद्दी संभाली और पंगाणा के उत्तर में मदनकोट दुर्ग का निर्माण करवाया और अपनी राजधानी भी घोषित की। फिर बाद में अपनी राजधानी लोहारा (बल्हघाटी) में स्थापित कर ली।

1620 ईस्वी में शुरू हुआ श्यामसेन का शासन, जिसे औरंगजेब ने नूरपुर के राजा जगत सिंह की शिकायत पर दिल्ली बुलाकर बंदी बना लिया। श्यामसेन के बाद इस गद्दी पर रामसेन बैठा, जिसने माधोपुर में रामगढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया। 1838 ईस्वी से लेकर 1876 ईस्वी तक उग्रसेन ने गद्दी संभाली और इस दौरान 1840 ईस्वी में सुकेत रियासत पर रणजीत सिंह के पोते नौनिहाल सिंह ने कब्जा कर लिया। लेकिन 6 वर्ष बाद 1846 ईस्वी में सुकेत रियासत अंग्रेजों के अधीन आ गई।

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1879 ईस्वी में सुकेत की गद्दी पर दुष्ट निकंदन सेन बैठा, जिसने 1893 ईस्वी में भोजपुर में स्कूल, 1900 ईस्वी में वनेड़ में पोस्ट ऑफिस, 1906 ईस्वी में टेलीग्रॉफ की स्थापना की। इसके अलावा उसने 1889 ईस्वी में ज्युरी में पुल का भी निर्माण करवाया था। सुकेत रियासत के अंतिम राजा लक्ष्मणसेन ने 1919 ईस्वी में गद्दी संभाली, उस दौरान सुकेत पंजाब सरकार के अधीन थी, जो दो साल बाद 1921 ईस्वी ब्रिटिश भारत सरकार के अधीन आ गई। फिर 1948 ईस्वी का वो समय आया, जब सुकेत भारत में विलय हुआ।

मंडी रियासत का इतिहास

मंडी रियासत की स्थापना सुकेत रियासत के राजा बाहूसेन ने 1000 ईस्वी में की थी, जो राजा साहूसेन के छोटे भाई थे। दोनों भाईयों में सम्बन्ध अच्छे न होने के कारण मंडी रियासत की शुरुआत की गई, जो 1948 ईस्वी तक चला। 13वीं व 14वीं शाताब्दी के बीच राजा रहे बाणसेन ने पराशर झील के पास पराशर मंदिर का निर्माण करवाया। इसके बाद शासन करने आए कल्याणसेन ने भी अपने राज में पुरानी मंडी के पास एक महल बनवाया था। 1527 ईस्वी में मंडी रियासत के राजा अजबर सेन बने और उन्होंने इसी साल मंडी शहर की स्थापना की और उसे ही अपनी राजधानी बना लिया। अजबर सेन के कार्यकाल में ही मंडी में भूतनाथ मंदिर और उनकी रानी सुलताना देवी ने त्रिलोकीनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था।

इसी क्रम में नारायण सेन (1575-95 ईस्वी) ने गद्दी संभाली और अपने कार्यकाल में यहां नारायण गढ़ किला बनवाया। फिर सूरजसेन (1637-64 ईस्वी) ने अपने कार्यकाल में मंडी दमदमा महल का निर्माण करवाया। 16 मार्च 1648 ईस्वी में मंडी में माधोराय की चांदी की प्रतिमा स्थापित करवाई गई, तभी से मंडी के शिवरात्रि मेले में रथयात्रा का आरम्भ हुआ। श्यामसेन (सूरजसेन का भाई) के कार्यकाल में ही श्यामा काली मंदिर का निर्माण करवाया गया था। सिद्धसेन (1684-1727 ईस्वी) ने 1695 ईस्वी में सरखपुर किला बनवाया। इसके अलावा उसने सिद्ध गणेश, त्रिलोकनाथ पंचवक्त्र और सिद्ध जालपा मंदिरों का भी निर्माण करवाया। सिद्धसेन को मंडी रियासत का एक योग्य व कुशल योद्धा माना जाता है।

15 अप्रैल 1948 का वो दिन आया, जब मंडी रियासत और सुकेत रियासत को हिमाचल में विलय कर दिया गया और इसे आजाद भारत का एक हिस्सा बना दिया गया, जो मिलकर मंडी जिला बना, जो आज भी अपनी खूबसूरती, मंदिरों व महलों के लिए जाना जाता है। मंडी रियासत के राजा जोगेन्दर सेन 1952 ईस्वी से लेकर 1956 ईस्वी तक ब्राजील में भारत के राजदूत रहे। फिर 1957 ईस्वी से लेकर 1962 ईस्वी तक मंडी संसदीय लोकसभा सीट से सांसद भी रहे।

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