कोलकाता का प्रसिद्ध बहूबाजार इलाका। जी हां, वहीं इलाका जहां कुछ सालों पहले मेट्रो के लिए सुरंग की खुदाई के दौरान पूरा का पूरा इलाका ही जमींदोज होने के कगार पर पहुंच चुका था। 62 नंबर हिदाराम बनर्जी लेन। इस मकान के आसपास के कई घर भी मेट्रो की सुरंग खुदाई के दौरान जमीन धंसने से टूट गये, कई घरों में बड़ी-बड़ी दरारें आ गयी।

लेकिन इस मकान की एक ईंट को भी कोई नुकसान नहीं पहुंचा। क्यों...क्योंकि इस घर में निवास करती हैं स्वयं देवी दुर्गा। इस घर का नाम दत्त बाड़ी (निवास) है लेकिन आसपास के लोग इस घर को 'बेलु बाड़ी' के नाम से जानते हैं। दरअसल, इस परिवार के पूर्वज बेल्जियम ग्लास का व्यापार करते थे। वहीं से इस घर को यह नाम मिला।
एक वक्त ऐसा भी था, जब इस परिवार में इतने धुमधाम से दुर्गापूजा का आयोजन होता था कि लोगों की आंखे चौंधिया जाती थी। कोलकाता के किसी जमींदार परिवार में भी देवी दुर्गा का स्वागत शायद इतने धुमधाम से नहीं किया जाता था, जितना बेलु बाड़ी या दत्त निवास में होता था। वर्ष 1883 में परिवार के मुखिया गोविंद लाल दत्त ने घर में दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी। लेकिन वर्ष 1896 में अचानक कुछ ऐसा हुआ कि धुमधाम तो दूर, घर में मां दुर्गा की पूजा करने तक में आर्थिक मुश्किलें आ रही थी। दरअसल, यह परिवार बेल्जियम ग्लास का व्यापार करता था। बेल्जियम से समुद्री जहाज में भरकर कांच कोलकाता की चाइनीज बाजार में लाया जाता था।

लेकिन साल 1896 में जब कांच से लदा जहाज कोलकाता की तरफ बढ़ रहा था तब समुद्र के खारे पानी के संपर्क में आने की वजह से करीब 2 क्विटल कांच बर्बाद हो गया। इस नुकसान से उबरने में इस परिवार को लंबा समय लग गया। परिवार के सदस्यों ने उस साल दुर्गा पूजा नहीं करने के बारे में सोचना भी शुरू कर दिया था। तभी एक दिन सपने में मां दुर्गा ने गोविंद लाल दत्त को दर्शन दिया और कहा "किसी दिखावे की जरूरत नहीं है।
मैं कुम्हारटोली (कोलकाता का वो मुहल्ला जहां देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं) में मन्मथ पाल के घर में बैठी हुई हूं। मुझे लेकर जा। सिर्फ गंगा जल और नारियल के लड्डू का भोग लगाकर सादगी के साथ ही मेरी पूजा कर।" मां दुर्गा का आदेश मानकर उनके बताए मूर्तिकार से ही उनकी प्रतिमा खरीदकर लायी गयी और ठीक वैसे ही उनकी पूजा की गयी जैसा मां दुर्गा ने सपने में आदेश दिया था।

आज इस परिवार का कोई सदस्य केंद्र सरकार का कर्मचारी है तो कोई सफल व्यापारी है। दुर्गापूजा के आयोजन के लिए रूपये-पैसे की कोई कमी नहीं है। लेकिन मां दुर्गा के बताए तरीके से ही आज भी इस परिवार में पूजा होती है। इस परिवार का मानना है कि कुम्हारटोली का कोई भी और कारिगर मां दुर्गा की उतनी शांत चित्त वाली प्रतिमा तैयार ही नहीं कर सकता है जितनी मन्मथ पाल का परिवार करता है। मन्मथ पाल की ही अगली पीढ़ी के सदस्य मुरारी मोहन पाल, वर्तमान समय में उपनगरीय शहर उत्तरपाड़ा में रहते हैं। वे हर साल कुम्हारटोली में सिर्फ इस परिवार की मूर्ति तैयार करने आते हैं। आज मां दुर्गा का मुख्य भोग मालपुआ और नारियल के लड्डू होते हैं।
महालया यानी जिस दिन से देवी पक्ष की शुरुआत होती है, उस दिन से इस परिवार में मांसाहार का सेवन करना बंद हो जाता है। (दुर्गा पूजा को पश्चिम बंगाल में घर की बेटी देवी दुर्गा का ससुराल कैलाश से धरती पर अपने मायके आना माना जाता है। इसलिए उस समय यहां जमकर खाने और खिलाने का रिवाज है।) दशहरा या विजयादशमी के दिन देवी दुर्गा को मंत्रों के द्वारा विदा करने के बाद परिवार के सदस्य मछली खाते हैं और उसके बाद मां दुर्गा की प्रतिमा विसर्जित की जाती है।



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