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भारत की अनसुनी जगह..जो दर्शाती है इतिहास को

भारत का शुमार विश्व के उन देशों में है जो अपने अनूठे वास्तु के चलते हर साल देश दुनिया के लाखों पर्यटकों को अपनी तरफ आकर्षित कर रहा है।

By Goldi

भारत का शुमार विश्व के उन देशों में है जो अपने अनूठे वास्तु के चलते हर साल देश दुनिया के लाखों पर्यटकों को अपनी तरफ आकर्षित कर रहा है। यहां आज भी कई ऐसे खंडहर, इमारतों क़िलों और कलाकृति है जो भारत के गौरवशाली इतिहास का बखान करती है।भारत की धरती पर मौजूद ये ईमारत ऐसे हैं जिनको सिर्फ देखने मात्र से ही खुद-ब-खुद वाह निकल जायगा और आप अपने और अपनी धरोहरों पर गर्व करेंगे।

इसी क्रम में आज हम आपको अवगत कराने जा रहे हैं, भारत की कुछ ऐसी खूबसूरत इमारतो से जहां आपको हमारी पुरानी सभ्यता, संस्कृति, जीवनशैली और कलाओं को जानने का मौका मिलेगा।

बिश्नुपुर,पश्चिम बंगाल

बिश्नुपुर,पश्चिम बंगाल

कोलकाता से लगभग 140 किलोमीटर दूर बिश्नुपुर, कोलकाता निवासियों का पॉपुलर वीकेंड डेस्टिनेशन है।17वीं और 18वीं शताब्दी में बने मखरला और पक्की मिट्टी के ईंटों से बने मन्दिर बिश्नूपुर को और भी खूबसूरत बनाते है। पक्की मिट्टी का प्रभाव यहीं समाप्त नहीं होता बल्कि शहर में इससे बने बर्तन, गहने और घरों के लिये सजावटी सामान भी मिलते हैं।PC: Amartyabag

लक्ष्मण मंदिर, सिरपुर

लक्ष्मण मंदिर, सिरपुर

लक्ष्मण मंदिर भारत में ईटों से निर्मित पहला मंदिर है। यह रायपुर से लगभग 90 किमी. की दूरी पर स्थित है, जो छत्‍तीसगढ की राजधानी है।इस मंदिर को देखकर आपको पुराने समय की तकनीक और जानकारी पर आश्चर्य होगा। ये मंदिर जिस वक़्त का है, तब ऐसी तकनीक नहीं थी कि इतनी ऊंचाई तक पत्थर और ईंट ले जाया जा सके। ईटों से बना यह मंदिर, एक ऊंचे प्‍लेटफॉर्म पर और तीन प्रमुख भागों में बना हुआ है जिन्‍हे गर्भ गृह ( मुख्‍य घर ), अंतराल ( पैसज ) और मंडप ( एक शेल्‍टर ) कहा जाता है। अन्‍य धर्मो को भी खूबसूरती से मंदिर में वातायान, चित्‍या गोवाक्‍सा, भारवाहाक्‍गाना, अजा, कीर्तिमख और कामा अमालक के रूप में डिजाइन किया गया है।PC:Ishita Srivastava

बुरहानपुर, मध्यप्रदेश

बुरहानपुर, मध्यप्रदेश

बुरहानपुर मध्य प्रदेश में ताप्ती नदी के किनारे पर स्थित खानदेश का एक प्रख्यात नगर है। यह नगर पहले ख़ानदेश की राजधानी हुआ करता था। 14वीं शताब्दी में इस नगर को ख़ानदेश के फ़ारूक़ी वंश के सुल्तान मलिक अहमद के पुत्र नसीर द्वारा बसाया गया। यहां पहाड़ों पर आपको मुग़लकालीन कई कलात्मक चित्र मिल जाएंगे।मुमताज़ महल की मौत के बाद पहले उनका शरीर यहीं पर 6 महीने तक दफ़न था, जिसे बाद में ताजमहल ले जाकर दफ़नाया गया था। बुरहानपुर में जामा मस्जिद, राजा की छतरी, दरगाह-ए-हकीमी शाही क़िला, गुरुद्वारा और मंदिर हैं, जहां आप घूम सकते हैं।PC:Yashasvi nagda

उनाकोटी, तिरपुरा

उनाकोटी, तिरपुरा

उनाकोटी पहाड़ियां अगरतला से लगभग 180 किलोमीटर दूर हैं। यहां के पत्थरों पर उकेरी गई कलाकृतियां 7वीं से 9वीं शताब्दी के बीच की हैं। यहाँ चट्टानों पर उकेरी गई छवियों में सबसे सुंदर शिव की ये छवि है जिसे उनाकोटि काल भैरव के नाम से जाना चाता है। इतिहासकार मानते हैं कि भिन्न भिन्न मूर्तियों से भरा पूरा ये इलाका करीब 9से 12 वीं शताब्दी के बीच पाल राजाओं के शासनकाल में बना। यहाँ के शिल्प में शैव कला के आलावा तंत्रिक, शक्ति और हठ योगियों की कला से भी प्रभावित माना गया है।PC: Shivam22383

देवरानी-जेठानी मंदिर,बिलासपुर

देवरानी-जेठानी मंदिर,बिलासपुर

देवरानी और जेठानी मंदिर, छत्तीसगढ़ में दक्षिण बिलासपुर से लगभग 29 किलोमीटर दूर ताला/तालागाँव मे मनियारी नदी के तट पर स्थित है। देवरानी मंदिर जेठानी मंदिर से छोटी है जो की भगवान शिव को समर्पित है, इस मंदिर का द्वार पूर्व दिशा की ओर है। मनियारी नदी मंदिर के पीछे की ओर बहती है और जेठानी मंदिर का द्वार दक्षिण दिशा की ओर है। है। देवरानी और जेठानी मंदिरों के बीच की दूरी लगभग 15 किमी है। खंडहर होने के बावजूद यहां आपको इतिहास की उन्नत कला के दर्शन होंगे। यहां 7 फुट ऊंची और 4 फुट चौड़ी एक प्रतिमा है, जिसका वज़न 8 टन से ज़्यादा है।इस मंदिर के स्थापत्य की कई बार नकल करने की कोशिश की गई, मगर वैसा मंदिर दोबारा कोई नहीं बना पाया।

फ़ार्रुख़नग, गुरुग्राम

फ़ार्रुख़नग, गुरुग्राम

फ़ार्रुख़नगर में मुग़लकालीन कई महल, क़िले और खंडहर हैं। इसे पहली बार 1732 में फौजदार ख़ान ने खोजा था, जो यहां के पहले नवाब भी बने थे।यहां फौजदार ख़ान द्वारा बनवाए गए शीश महल, जामा मस्जिद और बावली हैं।PC:Anupamg

दोमखर, लद्दाख

दोमखर, लद्दाख

कश्मीर के खूबसूरत क्षेत्र लद्दाख के दोमखर में आज भी पुराने समय के पत्थरों से बनाये गये चित्रों को भलीभांति देखा जा सकता है। इसे पहली बार 1902 में A.H. Francke ने खोजा था। यहां रात की हल्की रौशनी में टिमटिमाते तारों के बीच इन पत्थरों पर बैठना और इस पर उकेरी कलाकृतियां को देखना आपको अच्छा लगेगा।दोमखर लेह से लगभग 120 किलोमीटर दूर है।

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