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इस मंदिर में अपने साले के साथ विराजते हैं महादेव, सावन का है यहां विशेष महत्व

काशी ना सिर्फ महादेव की प्रिय नगरी है बल्कि काशी के कण-कण में भगवान शिव किसी ना किसी रूप में जरूर विराजमान हैं। बनारस में भगवान शिव ज्योतिर्लिंग काशी विश्वनाथ के अलावा कहीं भगवान शिव की लघु कचहरी तो कहीं, द्वादश ज्योतिर्लिंग के तौर पर विराजमान हैं।

sarangnath temple

बनारस के पास ही स्थित सारनाथ को मुख्य तौर पर भगवान बुद्ध की उपदेश स्थली के तौर पर जाना जाता है। लेकिन क्या आपको पता है, सारनाथ की एक और पहचान है जो ना सिर्फ महादेव बल्कि उनके ससुराल से भी जुड़ा हुआ है। सारनाथ में महादेव सारंगनाथ के रूप में विराजमान हैं।

आइए आपको सारंगनाथ मंदिर के बारे में विस्तार से बताते हैं :

एक गर्भगृह में दो शिवलिंग

sarangnath

भगवान शिव के ऐसे कई मंदिर हैं, जिनके गर्भगृह में दो शिवलिंग स्थापित हैं। सारनाथ में स्थित सारंगनाथ मंदिर के गर्भगृह में भी दो शिवलिंग स्थापित हैं। इनमें से शिवलिंग तो भोलेनाथ का प्रतिक है लेकिन दूसरा शिवलिंग उनके साले सारंगदेव का प्रतिक है। जी हां, आपने सही सुना। इस मंदिर के गर्भगृह में भगवान शिव माता पार्वती नहीं बल्कि अपने साले सारंगदेव के साथ विराजमान हैं। माना जाता है कि इस मंदिर में सावन के महीने में पूजा करने से मनचाहा फल जरूर मिलता है।

क्या है मंदिर का इतिहास

मंदिर में स्थापित भगवान शिव के प्रतिक शिवलिंग की स्थापना आदि शंकराचार्य ने की थी। सारंगनाथ मंदिर के साथ दो कहानियां जुड़ी हुई हैं। पहली कहानी के अनुसार सारंगनाथ प्रजापति दक्ष के पुत्र और सती के भाई हैं जबकि दूसरी कहानी के अनुसार सारंगनाथ देव हिमालय के पुत्र माता पार्वती के भाई हैं। हालांकि दोनों कहानियों के अनुसार ही भगवान शिव का साला सारंगदेव हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार जब देवी सती से भगवान शिव का विवाह हुआ तो उस समय सारंगदेव दूसरे स्थान पर तपस्या कर रहे थे।

sarangnath temple

जब वह वापस लौटे और उन्हें पता चला कि उनकी बहन का विवाह कैलाश में रहने वाले एक अघोरी के साथ हुआ है, तो वह काफी दुःखी और चिंतित हुए। उन्हें पता चला कि उनकी बहन सती अपने पति भोलेनाथ के साथ विलुप्त नगरी काशी में विचरन कर रही है। बस फिर क्या था, सारंगदेव ढेर सारा धन लेकर काशी की तरफ चल पड़े। रास्ते में जब वह उस स्थान पर पहुंचे, जहां वर्तमान समय में मंदिर है, उन्हें नींद आ गयी। सपने में उन्होंने देखा कि काशी सोने की नगरी बन गयी है। जैसे ही उनकी नींद खुली, उन्हें यह सोचकर बहुत ग्लानी हुई कि उन्होंने अपने बहनोई के बारे में क्या-क्या सोच लिया।

सारंगदेव की तपस्या और गोंद

ग्लानीभाव से सारंगदेव ने बाबा विश्वनाथ की तपस्या करने का निर्णय लिया। वह इसके बाद भगवान शिव की कठोर तपस्या करने लगे। तपस्या के दौरान उनके शरीर से लावे की तरह गोंद निकलने लगा, लेकिन सारंगदेव ने इसकी परवाह ना करते हुए अपनी तपस्या को जारी रखा। सारंगदेव की तपस्या से प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने माता सती के साथ उन्हें दर्शन दिया और अपने साथ काशी चलने के लिए कहा। इसपर सारंगदेव ने उस जगह की सुन्दरता का हवाला देते हुए वहां नहीं जाने की बात कही। साथ ही उन्हें आर्शिवाद दिया कि सावन के महीने में जो चर्मरोगी भी उनपर सच्चे मन से गोंद चढ़ाएगा, उसे सभी समस्याओं से मुक्ति मिल जाएगी।

सावन में देवी पार्वती को छोड़ यहां निवास करते हैं भोलेनाथ

जिस मान्यता में यह कहा जाता है कि सारंगदेव माता पार्वती के भाई हैं, उस कहानी में बताया जाता है कि सारंगदेव की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें आर्शिवाद दिया था कि हर साल सावन के महीने में वह माता पार्वती और काशी को छोड़कर सारनाथ के सारंगनाथ मंदिर में अपने साले के साथ निवास करेंगे। सारंगनाथ मंदिर के गर्भगृह में दो शिवलिंग हैं, जिसमें से एक शिवलिंग थोड़ा लंबा और दूसरा गोलाकार है।

file photo

मंदिर के पुजारी के अनुसार लंबा शिवलिंग भगवान शिव के साले सारंगदेव का प्रतिक है जबकि गोलाकार शिवलिंग भगवान शिव का प्रतिक है। मान्यता है कि अगर विवाह के बाद कोई जोड़ा इस मंदिर में भगवान शिव के दर्शन करने आता है तो उसके ससुराल और मायके के संबंध अच्छे बने रहते हैं। इस मंदिर में भगवान शिव के दर्शन से संतान सुख की भी प्राप्ति होती है।

मंदिर के ठीक बाहर है शिवकुंड

shiv kund

वाराणसी से लगभग 10 किमी उत्तर की ओर स्थित सारनाथ में स्थापित सारंगनाथ मंदिर के प्रांगण में एक प्राचीन शिवकुंड है। सारंगनाथ मंदिर में आने वाला प्रत्येक भक्त पहले शिवकुंड में स्नान करता है उसके बाद इसी कुंड से जल लेकर 44 सीढ़ियां चढ़कर सारंगनाथ मंदिर में भोलेनाथ का जलाभिषेक करने जाता है। इस मंदिर में श्रावण माह में पूजा करने का काफी खास महत्व है। इस वजह से ही यहां सावन में शिवभक्तों का हुजूम उमड़ता है। बताया जाता है कि चीनी नागरिक ह्वेंनसांग के यात्रा विवरण में भी सारंगनाथ मंदिर का उल्लेख मिलता है।

सारंगनाथ मंदिर वाराणसी स्टेशन और एयरपोर्ट से लगभग 10-15 किमी की दूरी पर ही है। यह मंदिर वाराणसी समेत कई प्रमुख शहरों से सड़क मार्ग से बेहद अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

FAQs
सारंगनाथ मंदिर के बाहर के कुंड का क्या नाम है?

सारंगनाथ मंदिर के बाहर के कुंड को शिवकुंड के नाम से जाना जाता है। मंदिर में भगवान शिव का जलाभिषेक करने के लिए भक्त इसी कुंड से जल लेते हैं।

सारंगनाथ मंदिर में सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं ?

हां, सारंगनाथ मंदिर के गर्भगृह तक पहुंचने के लिए 44 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। इन सीढ़ियों को चढ़ना आसान ही होता है लेकिन सावन के समय भीड़ ज्यादा होने की वजह से सीढ़ियां चढ़ते समय सावधानी बरतने की जरूरत होती है।

सारंगनाथ महादेव के मंदिर में भगवान शिव किसके साथ विराजमान हैं?

बनारस के पास ही स्थित सारनाथ में स्थापित सारंगनाथ महादेव के मंदिर में भगवान शिव अपने साले सारंगदेव के साथ विराजमान हैं। मान्यता है कि सावन में भगवान शिव काशी को छोड़कर इस मंदिर में निवास करते हैं।

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