प्राचीनकाल से ही हरियाणा एक समृत सांस्कृतिक इतिहास वाला क्षेत्र रहा है जिसका संबंध जाट, राजपूत, गुज्जर और मुगलों से रहा है। पूर्व में मेवात के नाम से जाने जाने वाले नूंह के इतिहास का टर्निंग प्वाएंट 12वीं शताब्दी में मुगलों का यहां आगमन रहा है। पहले राजपूत और बाद में मुगलों के आगमन की वजह से नूंह में हिंदू और इस्लामी सांस्कृतिक परंपराएं एक साथ ही विकसित हुई है।

आज भले ही कुछ नकरात्मक कारणों से नूंह चर्चाओं में छाया हुआ है लेकिन पर्यटन व इतिहास के लिहाज से नूंह हमेशा से ही भारतीय संस्कृति का धरोहर है।
आइए नूंह में घूमने की जगहों के बारे में विस्तार से बताते हैं :
नलहर शिव मंदिर
नलहर गांव अरावली पहाड़ी की तलहटी में बसा एक छोटा सा गांव है, जहां मौजूद है नलहर शिवमंदिर। दरअसल, यह मंदिर पहाड़ी के ऊपर मौजूद एक छोटे से जलाशय के ट्रेक का बेस है। जलाशय तक पहुंचने के लिए आपको पहाड़ी नहीं बल्कि यहां बनी 250 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। यह जलाशय महज 2 फुट लंबा और कुछ फुट चौड़ा ही है लेकिन जलाशय के पास मौजूद चट्टानों पर स्थित पेड़ में बने खोखले स्थान से पानी का लगातार टपकते रहना इसे काफी खास बनाता है। मान्यता है कि अपने 14 सालों के वनवास के दौरान पांडव यहां आए थे और इसी जलाशय से उन्होंने पानी पिया था। मंदिर में भगवान शिव के दर्शन करने आने वाले लोग जलाशय की ट्रेकिंग जरूर करते हैं।
छुईमल का तालाब

छुईमल का तालाब नूंह शहर में आने वाले लोगों का प्रमुख आकर्षण होता है। इस तालाब के आसपास एक भव्य दो मंजिला इमारत और छुईमल की समाधी है। इसके अलावा तालाब के आसपास कुल 8 कब्रें हैं। वर्तमान समय में भी यह तालाब छुईमल के वंशजों के स्वामित्व में ही है। इसलिए संभावना है कि तालाब के आसपास जिन लोगों की कब्रें बनी हैं, वो छुईमल के वंशज या उनसे ही संबंधित होंगे। छुईमल की मृत्यु के बाद उनके परिवार के लोगों ने इमारत में उनका मकबरा बना दिया। कहा जाता है कि यहां बनी इमारतों के नीचे काफी गहरा कुआं है। इसलिए तालाब का पानी कभी नहीं सुखता है।
कोटला का किला

जानकारी के अनुसार 13वीं शताब्दी में कोटला फोर्ट का निर्माण मेवाती यदुवंशी नवाब बहादूर नाहर खान ने दुश्मनों के छक्के छुड़ाने के लिए किया था। कोटला नूंह से लगभग 7 किमी की दूरी पर स्थित है। अपनी असीम प्राकृतिक सुन्दरता की वजह से भी कोटला पर्यटकों को आकर्षित करता है। इस किले के पास कई प्राकृतिक झरने हैं जिनकी सुन्दरता मानसून के समय बढ़ जाती है। पहाड़ी के नीचे एक मस्जिद है, जिसे फिरोजशाह तुगलक ने बनवाया था। इस मस्जिद को शाही मस्जिद कहा जाता है।
फिरोजपुर झिरका का शिवमंदिर
नूंह जिले में अलवर से 82 किमी की दूरी पर स्थित है फिरोजपुर झिरका। यहां मौजूद शिवमंदिर भी महाभारत से संबंधित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार पांडवों के सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर जब वनवास के दौरान विराटनगर जा रहे थे तब उन्होंने अपने मंत्रों की शक्ति से यहां गुफा में शिवलिंग उत्पन्न किया था। स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्ष 1870 में लगान अधिकारी पंडित जीवनलाल शर्मा के सपने में आकर भगवान शिव ने मंदिर का निर्माण करने का आदेश दिया था। महाशिवरात्रि पर इस मंदिर में विशाल मेला लगता है।
बारादरी का मकबरा

फिरोजपुर झिरका में ही बारादरी का मकबरा है जो मुगल वास्तुकला का शानदार नमूना है। इसका निर्माण 18वीं शताब्दी के अंत में किया गया था। लाल बलुआ पत्थर से चौकोर आकार में बने बारादरी के मकबरा में प्रवेश के लिए 4 बड़े और 8 छोटे द्वार हैं। मकबरे के ऊपर कुरान की आयतें लिखी हुई हैं। इसके साथ ही फूलों की काफी सुन्दर डिजाइनें बनायी गयी हैं। मकबरा अर्द्धगोलाकार गुंबद से ढंका हुआ है। वर्तमान समय में इस मकबरे पर स्थानीय एक मदरसा का संचालन किया जाता है जो इसकी देख-रेख करता है।



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