[Origin - नेटिवप्लैनेट की विशेष प्रस्तुति] ओरिन यानि उत्पत्ति! सीरीज़ में हम बात करने जा रहे हैं वाराणसी की। जी हां वाराणसी मतलब बनारस अथवा काशी। और महाशिवरात्रि के उपलक्ष्य में काशी विश्वनाथ बाबा के निवास स्थान पर चर्चा करना तो बनता है। चलिए बिना देर किए हम सीधे इतिहास के उन पन्नों में चलते हैं, जो हज़ारों वर्ष पूर्व लिखा गया। वैसे आपको मालूम होगा कि काशी देश का सबसे प्राचीन शहर है और इसक प्रमाण आज भी मिलते हैं। इस लेख में हम फिलहाल काशी नगर के नाम की उत्पत्ति पर चर्चा करेंगे।

आपको बता दें कि इस लेख में हम काशी के बारे में जो भी बात करने जा रहे हैं वो 2006 में वीबीएस पूर्वांचल विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में हुए एक शोध पर आधारित है। यह शोध डॉ. अशोक कुमार चौधरी ने किया था, जिसमें बनारस के सामाजिक और आर्थिक जीवन पर विशेष रूप से चर्चा की गई है। महाश्विरात्रि के पावन पर्व पर अगर आप काशी विश्वनाथ के दर्शन करने जा रहे हैं, तो इस लेख में लिखी हुईं बातें आपकी भक्ति को और अधिक तीव्र करने का काम करेंगे।
काशी नाम की उत्पत्ति
धर्मग्रंथों के अनुसार भोलेनाथ काशी विश्वनाथ से। कहा जाता है कि प्राचीन काल में धर्म को फिर से संस्थापित करने के लिए भगवान शिव इसी स्थान पर आये थे।
हमारे प्राचीन पवित्र धार्मिक ग्रन्थों के संरक्षक एवं टीकाकार भगवान व्यास का जन्म काशी में हुआ था।
भगवान् बुद्ध ने अपने मानव - प्रेम का सुन्दर उपदेश यहीं से आरम्भ किया था।
काशी का इतिहास बहुत प्राचीन समय से प्रारम्भ होता है। यह संसार के सबसे प्राचीन नगरों में से एक है। यह पवित्रात्माओं का स्मृति शहर है। यही वह पुण्यस्थान है जहाँ राजा हरिश्चन्द्र अपने सत्यप्रेम के कारण अपना नाम युगयुगान्तर के लिये अमर कर गए। यहीं संत कबीर तथा गोस्वामी तुलसीदास जैसे कवियों ने अपने प्राण इसी भूमि में त्यागे थे।

बनारस, आनंदवन, वाराणसी, अविमुक्त या महाश्मशान
वाराणसी विभिन्न नामों से विख्यात है, यथा काशी, बनारस, वाराणसी, आनन्दवन, अविमुक्त क्षेत्र और महाश्मशान।
वाराणसी- वरुणा और अस्सी के बीच के क्षेत्र को वाराणसी कहा जाता है। अतः वाराणसी काशी का भौगोलिक नाम है।
आनंदवन- भगवान् शंकर की क्रीड़ा-स्थली होने के कारण इसे 'आनन्दवन' अथवा 'आनन्द कानन' कहा जाता है।
अविमुक्त- भगवान शंकर और पार्वती चूँकि इस क्षेत्र को कभी नहीं छोड़ते हैं, इसलिए इसे 'अविमुक्त' कहा जाता है।
काशी- 'काशी' शब्द 'काश्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है चमकना 'काश दीप्तौ'। आप्टे ने 'काश्' का अर्थ दिया है। वेदों में एक वाक्य है- काश्यां मरणात् मुक्तिः मतलब काशी में देहमुक्त होने से जीव जन्म-मरण के चक्र से बाहर चला जाता है। इसी विश्वास के कारण लोग यहाँ मृत्यु का वरण करने आते हैं।
महाश्मशान - चूँकि यहाँ शवों का दाह संस्कार अनवरत होता रहता है, इसीलिए इस नगर को 'महाश्मशान' भी कहा जाता है।

प्राचीन काल के दस्तावेजों में काशी का वर्णन
काशी के प्रति गोस्वामी तुलसीदास का प्रबल अनुराग उनकी इन पंक्तियों में साफ झलकता है-
मुक्ति जन्म महि जानि ज्ञान खानि अघ हानि कर ।
जहँ बस संभु भवानि, सो कासी सेइअ कस न||
काशी नगरी से आदिकाल से ही विद्या एवं धर्म का प्रचार-प्रसार होता रहा है। काशी की प्राचीनता का इतिहास वैदिक साहित्य से उपलब्ध होता है। अथर्ववेद में काशीवासियों के लिए 'काशयः' शब्द का प्रयोग मिलता है।
ब्राह्मण साहित्य में गोपथ ब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण, वृहदारण्यक उपनिषद्, कौषीतकी उपनिषद् में काशिराज का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
महर्षि पाणिनि ने काशी शब्द को गण के आदि में दिखलाया है। 'अष्टाध्यायी में 'काशीयः' रूप की भी सिद्धि बताई गई है।"
ऋग्वेद की सर्वानुक्रमणिका में ऋषि प्रतर्दन को काशिराज कहा गया है। हिरण्य केशि गृह्यसूत्र ने तर्पण में काशीश्वर को विष्णु एवं रुद्रस्कन्द के साथ उल्लिखित किया है।
पतंजलि के महाभाष्य में 'काशि- कोसलीया: उदाहरण के रूप में दिया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि काशी का नाम पतंजलि के समय यानि ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी से चलता आया है।

महाभारत और रामायण में काशी का उल्लेख प्राप्त होता है। वाल्मीकीय रामायण के अनुसार दशरथ ने अपने अश्वमेघ यज्ञ में काशिराज को भी आमंत्रित किया था। महाभारत में काशिराज का महाभारत के युद्ध में पाण्डवों की ओर से लड़ने के प्रसंग में और तीर्थ के रूप में उल्लेख मिलता है।
पुराणों में काशी की विशद् प्रस्तुति मिलती है। काशी को मोक्ष दायिनी कहा गया है। काशी का उल्लेख बौद्ध तथा जैन ग्रन्थों में भी उपलब्ध होता है। बुद्ध-काल (कम से कम पाँचवीं ई. पू. शताब्दी) में काशी महाजनपदों में प्रसिद्ध थी। 7 गौतम बुद्ध ने काशी के सारनाथ में 'धर्मचक्र प्रवर्तन' किया था। जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ हुए थे जो अन्तिम तीर्थंकर
उन्होंने काशी में मौर्यवंशी सम्राट् अशोक ने महावीर से 250 वर्ष पूर्व लगभग 777 ई.पू. उत्पन्न ही चैत्र कृष्ण चतुर्थी को जन्म ग्रहण किया था। काशी के पास सारनाथ में धम्मेक स्तूप की स्थापना की। " गुप्त सम्राट् स्कन्दगुप्त ने हूणों को परास्त करने के लिए काशी की यात्रा की। " मध्ययुग की 12वीं शताब्दी में गाहड़वाल राजाओं ने काशी को अपनी राजधानी बनाया। आज भी काशी में राजघाट के पास इन राजाओं के दुर्ग के खंडहर मौजूद हैं, और इस शहर के समृद्ध इतिहास की गवाही दे रहे हैं।



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