पूरे भारत में शायद ही ऐसा कोई राज्य होगा जहां कोई किला नहीं बनवाया गया हो। लेकिन आज हम भारत के सबसे विशाल किले राजस्थान के 'चित्तौड़गढ़ किले' की बात कर रहे हैं। चित्तौड़गढ़ का किला 3 जौहर का साक्षी रह चुका है।

काफी कम लोगों को ही पता है कि इस किले का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मन की बात' के 100वें एपिसोड में देश की 13 धरोहरों का उल्लेख किया जिसमें राजस्थान से एकलौता चित्तौड़गढ़ का किला शामिल था।
चलिए आपको बताते हैं आखिर क्यों इतना खास है चित्तौड़गढ़ किला
700 एकड़ की भूमि में फैला हुआ है
चित्तौड़गढ़ का किला राजस्थान के बेराच नदी के किनारे बसा हुआ है। यह किला एक पहाड़ी की चोटी पर बना है और राज्य में सबसे ज्यादा देखे जाने वाले पर्यटन स्थलों में है। यह किला भारत का सबसे बड़ा किला माना जाता है। इस किले की लंबाई 3 किमी के क्षेत्र और परिधीय लंबाई 13 किमी में फैली हुई है। यानी यह किला लगभग 700 एकड़ के क्षेत्र में फैला हुआ है।

माना जाता है कि इस किले का निर्माण 7वीं सदी में मौर्यों द्वारा करवायी गयी थी। साल 2013 में इस किले को यूनेस्को की हेरिटेज लिस्ट में शामिल किया गया है। इस किले पर अलग-अलग समय कई राजाओं ने शासन किया है जिनमें शहंशाह अकबर भी शामिल हैं।
हर दरवाजे की है अलग कहानी
चित्तौड़गढ़ किला परिसर में लगभग 65 ऐतिहासिक संरचनाएं हैं जिसमें 4 महल, 19 मुख्य मंदिर, 7 प्रवेश द्वार, 4 स्मारक और 22 जल निकाय शामिल हैं। हालांकि बताया जाता है कि पहले इस किले में 84 जल निकाय थे लेकिन उनमें से अब 22 ही रह गए हैं। किले के 7 प्रवेश द्वार में पाडन पोल, भैरव पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, जोड़ला पोल, लक्ष्मण पोल और राम पोल शामिल हैं।

कहा जाता है कि एक भीषण युद्ध के बाद यहां खुन की नदियां बहने लगी थी जिसमें एक पाड़ा (भैंस का बच्चा) बहता हुआ यहां तक आ गया था। इसी वजह से पहले दरवाजे का नाम पाडन पोल पड़ा। इसी तरह बाकी के 6 दरवाजों के नाम के पीछे भी कोई ना कोई कहानी छिपी हुई है।
3 बार जौहर का साक्षी है चित्तौड़गढ़ किला

कहा जाता है कि चित्तौड़गढ़ किले में एक साथ 1 लाख से ज्यादा लोग रहा करते थे, जिनमें राजा, उनकी रानियां, दास-दासियां और सैनिक होते थे। इस किले में सबसे पहला जौहर राजा रतनसिंह के शासन काल में रानी पद्मिनी के नेतृत्व में किया गया था। अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय उन्होंने 16 हजार दासियों के साथ जीवित ही अग्नि समाधी ले ली थी। इसके बाद 16वीं सदी में रानी कर्णावती के नेतृत्व में 13000 दासियों ने जौहर किया। यहां आखिरी बार रानी फुलकंवर ने हजारों स्त्रियों व दासियों के साथ जौहर किया था। इस किले में जौहर के लिए अलग स्थान सुरक्षित था।
महाभारत से संबंधित है किला
काफी कम लोगों को ही पता है कि चित्तौड़गढ़ किले का संबंध महाभारत काल से है। लोककथाओं के अनुसार इस किले का निर्माण महाभारत काल में किया गया था। कहा जाता है कि भीम एक बार संपत्ति की खोज करने निकले। उस समय वह एक योगी से मिले जिसके पास पारस पत्थर था। योगी से जब भीम ने पारस पत्थर मांगा तो उन्होंने कहा कि अगर भीम रातोंरात उनके लिए एक किला बना दे तो वह उन्हें पारस पत्थर दे देंगे।

इसके बाद अपने भाईयों के साथ मिलकर भीम इस किले का निर्माण करने लगे। जब योगी ने देखा कि सुबह से पहले भीम किले का निर्माण कर लेंगे तो उन्होंने कुकड़ेश्वर नामक यति से मुर्गे की तरह बांग देने के लिए कहा। भीम को लगा कि सुबह हो गयी है और भीम ने गुस्से में जमीन पर जोर से अपनी लात मारी। इससे एक गड्ढ़ा बन गया जिसे लोग आज भी लत-तालाब कहते हैं। किले के अंदर मौजूद महादेव के मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इस मंदिर में मौजूद भगवान शिव की विशाल मूर्ति को भीम अपने बाजू पर बांध कर घूमते थे।
कैसे पहुंचे चित्तौड़गढ़ किला
चित्तौड़गढ़ हर मौसम में खुला रहता है और पर्यटकों को इसमें प्रवेश करने की पूरी आजादी है। इस किले के अंदर कई महल हैं, जिनमें रानी पद्मिनी का महल, मीराबाई का महल, राणा कुंभा महल और भी कई। इस किले में सुबह 7 और शाम 8 बजे लाइट एंड साउंड शो होता है। वयस्कों के लिए किले में प्रवेश का शुल्क 50 रुपये और बच्चों के लिए 25 रुपये है। किले का संग्रहालय सोमवार को बंद रहता है।

सड़क मार्ग से आने पर चित्तौड़गढ़ किला जयपुर से 300 किमी, उदयपुर से 200 किमी और जोधपुर से 312 किमी की दूरी पर है। उदयपुर और जयपुर से चित्तौड़गढ़ के लिए आपको टैक्सी किराए पर मिल जाएगी। चित्तौड़गढ़ का सबसे नजदीकी एयरपोर्ट उदयपुर का महाराणा प्रताप एयरपोर्ट है। ट्रेन से आने पर चित्तौड़गढ़ का नजदीकी स्टेशन चित्तौड़गढ़ है जो किले से महज 6 किमी की दूरी पर है। 11 किमी की दूरी पर चंदेरिया रेलवे स्टेशन भी है।



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