पिछले लगभग 1 सप्ताह तक दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर 'गंभीर' बने रहने के बाद हालातों में थोड़ा सुधार तो हुआ है लेकिन दिल्ली में वायु की गुणवत्ता का सूचकांक (AQI) अभी भी 'बहुत खराब' बना हुआ है। पिछले गुरुवार (21 नवंबर) को सुबह के समय दिल्ली में सीजन का सबसे कम तापमान रिकॉर्ड किया गया।
मौसम विभाग से मिली जानकारी के अनुसार गुरुवार की सुबह दिल्ली का न्यूनतम तापमान 10.2 डिग्री सेल्सियस रहा जो सामान्य से 2.1 डिग्री कम रहा।

बात अगर पिछले सोमवार और मंगलवार की करें, तो दिल्ली का AQI खतरनाक श्रेणी का बना हुआ था, जब दिल्ली का औसत AQI 450 को पार कर गया था। हालांकि बुधवार को दिल्ली के AQI में थोड़ा सुधार तो हुआ लेकिन यह अभी भी गंभीर ही बना हुआ है।
बता दें, वायु की गुणवत्ता का सूचकांक (AQI) अगर शून्य से 50 के बीच रहता है तो इसे 'अच्छा' माना जाता है, 51 से 100 के बीच इसे 'संतोषजनक' माना जाता है, 101 से 200 के बीच 'गंभीर', 201 से 300 के बीच 'अति गंभीर', 301 से 400 के बीच 'खतरनाक' और 401 से 500 के बीच 'बेहत खतरनाक' माना जाता है। लेकिन क्या कभी आपने यह सोचा है कि लगभग हर साल दिल्ली में ऐसी स्थिति सिर्फ सर्दियों के मौसम में ही होती है, गर्मियों में क्यों नहीं? इस सवाल का जवाब देते हुए IIT कानपुर के प्रोफेसर एसएन त्रिपाठी ने स्मॉग (Smog) के बनने का पूरा रसायन समझाया।
कैसे बनता है स्मॉग (Smog)?
कोहरा हवा में मौजूद जल वाष्प का संघनित रूप है। इसमें जब धरती की सतह पर मौजूद प्रदूषण के कुछ कण भी शामिल हो जाते हैं, तब वह स्मॉग (Smog) कहलाता है। हवा की स्थिरता वातावरण से प्रदूषण के कणों को फैलाने में असफल होता है, जिसकी वजह से यह लंबे समय तक हवा में मौजूद रह जाता है। वायु की स्थिरता अत्यधिक आद्रता वाले वातावरण में जलवाष्प के संचयन को भी बढ़ा देती है।

इससे कोहरे की बूंदें वायुमंडल में ज्यादा समय तक बनी रहती है जिससे उन्हें वायु प्रदूषण के ज्यादा कणों को अवशोषित करने में मदद मिल जाती है। सर्दियों के मौसम में मैदानी इलाकों में धुंध ज्यादा फैला रहता है, जिसका अर्थ होता है कि वायु की खराब स्थिति भी लंबे समय तक बनी रहती है।
क्यों सिर्फ सर्दियों में ही?
सर्दियों के मौसम में पृथ्वी की नीचली सतह के पास की हवा सघन होती है जिस कारण वायुमंडल का सबसे निचला भाग यानी ग्रहीय सीमा परत की हवा काफी पतली होती है। गर्म हवा के नीचे फंसी हुई ठंडी हवा एक प्रकार का पर्यावरणीय स्थिति 'LID' बनाती है। यह घटना शीतकालीन इंवर्शन कहालाता है। चुंकि हवा का वर्टिकल मिश्रण सिर्फ इसी परत के अंदर होता है, इसलिए प्रदूषण कारक कणों को वातावरण में फैलने के लिए ज्यादा जगह नहीं मिल पाती है।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी - कानपुर, कोटक स्कूल ऑफ सस्टेनबिलिटी के डीन प्रो. एस एन त्रिपाठी ने बताया कि पार्टिकुलर मैटर (PM) कोहरे के संपर्क में आने बाद अपनी प्रकृति बदलता है जो अधिक कोहरे को रास्ता देता है। उन्होंने बताया कि सर्दियों के बढ़ने के साथ ही इस स्थिति के और भी खराब होने की संभावनाएं बढ़ जाती है, क्योंकि ठंड बढ़ने के साथ ही आद्रता का बढ़ना भी जुड़ा हुआ है।

इसके साथ ही PM में अधिक जल धारण करने क्षमता का बढ़ना भी शामिल है। जब कोहरा खत्म हो जाता है जब जल वाष्प या पानी की बूंदें भी भाप बनकर उड़ जाती हैं और अपने पीछे छोड़ जाती हैं पार्टिकुल मैटर (PM)। यहां एक छोटी सी रसायनिक प्रक्रिया होती है, जो PM के ऑक्सीकरण को और भी अधिक बढ़ा देता है। प्रो. त्रिपाठी ने बताया कि गैर-ऑक्सीकृत घटकों की तुलना में ऑक्सीकृत PM और कोहरा संघनन न्यूक्लिक का गहरा संबंध है।
वास्तव में प्रदूषण के छोटे कण जल्दी ऑक्सीकृत हो जाते हैं। ऑक्सीकृत PM अधिक कुशल होते हैं जिस वजह से एक दिन पहले के मुकाबले कोहरे का बनना अधिक आसान हो जाता है। ये सभी स्थितियां एक चक्र (दुष्चक्र) की तरह चलती रहती हैं जिसके कारण हमें कोहरे से कभी मुक्ति नहीं मिल पाती है। ऐसा ही हमने पिछले दिनों भी देखा है।



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