राजस्थान का हॉन्टेड गांव कुलधरा के बारे में तो सभी जानते हैं। अरे हां भई, वहीं गांव जो रातों-रात वीरान हो गया था। सिर्फ इतना ही नहीं, जाते-जाते इस गांव में रहने वाले लोगों ने इसे श्राप भी दिया कि फिर कभी कुलधरा नहीं बस पाएगा। कहा जाता है कि आज भी राजस्थान का यह गांव इस श्राप की वजह से ही सुनसान और वीरान पड़ा हुआ है।
गांव खाली कर यहां रहने वाले लोग बसने के लिए दूसरी जगह चले गये। लेकिन क्या आप जानते हैं, इस गांव में रहने वाले ग्रामीणों को कहीं और से आकर ही यहां बसना पड़ा था। यानी इस गांव के लोगों को बार-बार अपना घर उजाड़कर मजबूरन दूसरी जगहों का रुख करना पड़ा है।

कौन रहते थे इस गांव में? क्यों उजड़ गयी कुलधरा? कहां से आए थे और फिर कहां गये इस गांव के रहने वाले?
कौन रहते थे कुलधरा में?
राजस्थान के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल जैसलमेर से महज 18 किमी की दूरी पर मौजूद है। यह गांव इतना डरावना, वीरान और सूना दिखता है कि दूर से देखने पर ही लोगों की रुह कांप जाती है। यह गांव पिछले लगभग 200 सालों से वीरान पड़ी हुई है। कहा जाता है कि इस गांव में किसी समय चारों तरफ हरियाली और चहल-पहल हुआ करती थी। इसे सरस्वती नदी के किनारे कधान नामक एक पालीवाल ब्राह्मण ने बसाया था। इस गांव में सिर्फ पालीवाल ब्राह्मण ही रहा करते थे। कहा जाता है कि यहां 600 लोगों को बसाया गया था।
क्यों उजड़ी कुलधरा?

लोककथाओं के मुताबिक गांव के जैसलमेर राज्य के मंत्री सलीम सिंह की गंदी नजर गांव की बहु-बेटियों पर रहा करती थी। गांव से वह मनमाने तरीके से ब्याज वसूला करता था। उसकी गंदी नजरों से गांव के प्रधान की बेटी भी नहीं बच पायी थी। जमींदार ने शर्त रखी कि या तो पूर्णमासी तक प्रधान की बेटी की शादी उससे करवा दी जाए नहीं तो अगले दिन वह गांव पर धावा बोलकर लड़की को उठा लाएगा।
गांव के लोगों के लिए अपनी बेटी की इज्जत ज्यादा प्यारी थी, इसलिए उन्होंने रातोंरात इस गांव को खाली करके चले जाने का फैसला लिया। कहा जाता है कि गांव खाली करके जाते समय ब्राह्मणों ने यह श्राप दिया कि यह गांव पूरी तरह से उजड़ जाएगी और यहां कोई नहीं रह पाएगा।
कहां से आए थे पालीवाल ब्राह्मण?
कुलधरा में रहने वाले पालीवाल ब्राह्मण इस गांव के मूल निवासी नहीं थे। वे राजस्थान के पाली जिले के रहने वाले थे। किसी समय पाली एक समृद्ध हुआ करता था, जहां अक्सर मुगल लूट-पाट मचाया करते थे। पाली पर कई बार मुगलों ने आक्रमण किया। वर्ष 1347 में जब फिरोजशाह दिल्ली का सम्राट बना तो उसने पाली को जीतने की कई कोशिशें की।

कहा जाता है कि जब लाख कोशिशों के बाद वह असफल हो गया तो उसने गांव में साफ पानी के एकमात्र स्रोत 'लोहड़ी तालाब' में पशु को मारकर डाल दिया। इससे पूरी तालाब दूषित होकर सूख गयी। उस समय राजपूत शासकों ने पाली को बचाने का प्रयास किया लेकिन जब सभी रास्ते बंद नजर आए, तब पालीवाल ब्राह्मण युद्ध भूमि में उतरें। लेकिन वे भी असफल रहे और मारे गये। जो इक्का-दुक्का बचे थे, उन्होंने मुगलों के अधीन रहने के बजाए रातोंरात पाली छोड़कर जाने का फैसला लिया। उसी समय वे कुलधरा गांव में आकर बस गये।
कुलधरा छोड़कर रातों-रात ब्राह्मण चले तो गये लेकिन इतने लोग एक रात में कहां गये, इस बारे में किसी को कुछ पता नहीं चल पाया। कहा जा सकता है कि कुलधरा छोड़कर पालीवाल ब्राह्मणों का जाना आज भी एक रहस्य ही है। कुछ लोगों का तो यह भी मानना है कि कुलधरा में पानी का स्तर काफी तेजी से जमीन के नीचे चला जा रहा था। इस वजह से ही गांव के लोगों ने इसे छोड़ने का फैसला लिया। वजह चाहे जो भी रही हो। आज कुलधरा एक पर्यटन स्थल जरूर है, लेकिन शाम को 5 बजे के बाद कुलधरा में किसी को रुकने की इजाजत नहीं होती है।



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