वाराणसी, काशी या बनारस...चाहे जिस नाम से भी पुकार लें, लेकिन इस शहर का अध्यात्मिक महत्व जरा भी कम नहीं होने वाला है। गंगा नदी के किनारे बसी महादेव की इस नगरी को दुनिया का सबसे पुराना नगर माना जाता है। कहा जाता है काशी महादेव के त्रिशुल पर स्थित है।
यहां की सुबह और शाम दोनों को ही पवित्र माना जाता है और दोनों के अलग-अलग रंग भी होते हैं। पूरी वाराणसी में गंगा के 80 से अधिक घाट हैं, जिनमें से हर एक घाट की अपनी अलग कहानी है और अपना खास महत्व है। काशी में आने वाला हर व्यक्ति, फिर वह चाहे आस्तिक हो या नास्तिक ही क्यों न हो, गंगा घाट के इन घाटों पर कुछ पल बिताने जरूर आता है।

और यहां आने वाला हर इंसान इस बात को अनुभव करता है कि बनारस में गंगा के घाटों पर महज कुछ पल बिताने से ही जो सुकून मिलता है, वह दिल की गहराईयों को छु लेता है।
बनारस के वो गंगा घाट, जिन्हें अपनी ट्रिप पर Miss करने का अफसोस आप बिल्कुल नहीं करना चाहेंगे :
दशाश्वमेध घाट
काशी विश्वनाथ मंदिर के बहुत नजदीक ही यह घाट स्थित है। हर शाम यह घाट भव्य गंगा आरती से जगमगा उठता है। पौराणिक मान्यताओं में कहा जाता है कि भगवान ब्रह्मा ने इसी स्थान पर 10 अश्वमेध यज्ञ की बलियां चढ़ायी थी।

अस्सी घाट
काशी की शाम अगर दशाश्वमेध घाट हैं, तो सुबह अस्सी घाट है। किसी जमाने पर यह घाट असी नदी (जो अब सूख चुकी है) और गंगा के संगम पर स्थित थी। यह घाट उन चुनिंदा घाटों में से है जो बनारस हिंदु यूनिवर्सिटी के पास मौजूद है। इस घाट पर सुबह के समय होने वाली गंगा आरती देखने वाली होती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अस्सी घाट पर मां दुर्गा ने शुंभ और निशुंभ नामक दो असुरों का अंत किया था।
मणिकर्णिका घाट
बनारस का सबसे अलग घाट है। मणिकर्णिका घाट एक ऐसा घाट है जहां चिता की अग्नि कभी नहीं बुझती है। जी हां, यह घाट ही साबित करता है कि बनारस में जन्म के साथ-साथ मृत्यु भी कितनी शुभ मानी जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को दुनिया भर में भटकने से रोकने के लिए अपनी कानों की बालियां छिपा दी और उसने कहा कि उन्होंने गंगा घाट पर उसे खो दिया है। इस कहानी के अनुसार जिस व्यक्ति का भी यहां अंतिम संस्कार किया जाता है, महादेव उस व्यक्ति की आत्मा से पूछते हैं कि क्या उसे माता पार्वती के कानों की बालियां मिली हैं।

हरिश्चंद्र घाट
बनारस का एक और महत्वपूर्ण घाट है हरिश्चंद्र घाट। कहा जाता है कि इस घाट का नाम राजा हरिश्चंद्र (जो भगवान राम के पूर्वज थे) के नाम पर रखा गया है। इस घाट पर भी शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है।
केदार घाट
इस घाट का नाम यहां मौजूद केदारेश्वर शिव मंदिर के नाम पर पड़ा है। केदारेश्वर शिव मंदिर बनारस के 12 ज्योतिर्लिंगों में एक है। इस घाट की सीढ़ियों पर ही गौरी कुंड भी मौजूद है, जिसका न सिर्फ धार्मिक बल्कि स्थानीय लोगों की मान्यताओं में भी काफी अधिक महत्व है।

तुलसी घाट
तुलसी घाट का नाम महाकवि तुलसीदास के नाम पर पड़ा है। कहा जाता है कि इसी घाट की सीढ़ियों पर बैठकर महाकवि तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना की थी।
अध्यात्मिक महत्व के साथ-साथ इन सभी घाटों की सुन्दरता ही ऐसी है कि देसी हो या विदेशी, यहां आने वाले हर एक सैलानी को अपनी तरफ आकर्षित करता है। बनारस आने वाले अधिकांश पर्यटकों की सुबह और शाम इन्हीं घाटों पर बीतती है जो उन्हें हजारों की भीड़ में भी सुकून का अनुभव कराती है।



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