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काशी के मणिकर्ण‍िका घाट पर क्या कहता है न्यूज़ीलैंड का रिसर्च?

मणिकर्ण‍िका घाट अपने अंदर तमाम रहस्य संजोये हुए है। यह आध्‍यात्म का विचित्र नमूना पेश करता है। इस घाट पर जहां एक तरफ चिताओं की अग्नि कभी नहीं बुझती है वहीं दूसरी ओर न जाने कितनी रहस्यमय घटनाएं होती हैं। आखिर ऐसा क्या है, जो इसे काशी के दूसरे घाटों से अलग बनाता है। यहां के लोग मानते हैं कि जिस दिन यहां पर चिता जलनी बंद हो जाएंगी, उस दिन वाराणसी के लिए प्रलय का दिन होगा। घाट के बारे में गहराई से जानने के लिए न्यूजीलैंड के एक संस्थान ने यहां पर रिसर्च किया, जिसका जिक्र हम इस लेख में आगे करेंगे।

Manikarnika Ghat of Varanasi

मणिकर्णिका घाट का इतिहास

यह घाट काशी के सबसे पुराने घाटों में से एक है। हिन्‍दू धर्म में अन्‍य घाटों की तुलना में इसे सर्वोच्च स्थान दिया गया है। ऐसा माना जाता है कि अगर इस घाट पर किसी का अंतिम संस्कार किया जाता है तो उसे तुरंत मोक्ष की प्राप्ति होती है। पुराणों में इस बात का जिक्र है कि इस स्थान पर आकर मौत भी दर्दहीन हो जाती है। यानि कि जिस व्यक्ति की मृत्यु इस स्थान पर होती है उसे किसी भी प्रकार के दर्द की अनुभूति नहीं होती है। यह घाट सिंधिया घाट और दशाश्‍वमेध घाट के बीच स्थित है। बहुत कम लोग जानते हैं कि मणिकर्णिका घाट का उल्लेख पांचवीं शताब्दि के एक गुप्‍त अभिलेख में मिलता है।

मणिकर्णिका घाट की पौराणिक कथा- कैसे पड़ा इस घाट का नाम

पौराणिक कथा के अनुसार जब देवी आदिशक्ति ने जब देवी सती के रूप में अवतरण लिया था, तब अपने पिता के अपमान के चलते अग्नि में कूद गई थीं। उस समय उनके जलते शरीर को भगवान शिव हिमालय तक ले गए। उस समय भगवान विष्‍णु ने अपना सुदर्शन चक्र देवी आदिशक्ति के जलते हुए शरीर पर फेंका जिससे उनके शरीर के 51 टुकड़े हो गए। वो सभी टुकड़े जहां-जहां गिरे उन्‍हें शक्तिपीठ घोषित किया गया था। उसी समय मणिकर्णिका घाट पर माता सती की कान की बालियां गिरीं। और उसी के बाद से इस स्थान को शक्तिपीठ घोषित कर दिया गया। दरअसल कान की बाली को संस्कृत में मणिकर्ण‍िका कहते हैं, इसलिए इस घाट का नाम भी मणिकर्ण‍िका घाट पड़ा। तब से यह स्थान विशेष महत्व रखता है।

मणिकर्णिका घाट पर कुएं का रहस्य

इस घाट पर एक कुआं है, जिसे मणिकर्णिका कुंड के नाम से जाना जाता है, इसे भगवान विष्‍णु ने बनवाया था। हिन्‍दू पौराणिक कथाओं के मुताबिक भगवान शिव जब माता पारवती के साथ एक बार काशी आये थे। भगवान ने दैव दंपत्ति के स्नान के लिए गंगा नदी के तट पर एक कुआं खोदा। जब भगवान शिव स्नान कर रहे थे, तब उनके कान की बाली से एक मणि कुएं में गिर गई। और आज तक नहीं मिली।

Manikarnika Ghat of Varanasi

एक और कथा के अनुसार भगवाण शिव को अपने भक्तों से छुट्टी ही नही मिल पाती थी। देवी पार्वती इससे परेशान हुईं, और उन्‍होंने शिवजी को रोके रखने के लिए अपने कान की मणिकर्णिका वहीं छुपा दी और शिवजी से उसे ढूंढने को कहा। शिवजी उसे ढूंढ नही पाये।

यही कारण है कि आज भी अकसर अंत्येष्टि संस्कार के दौरान पंडित मत्रोच्चारण के साथ-साथ शव से कहते हैं कि अगर उसने वह मणिकर्ण‍िका देखी हो, तो ऊपर भगवान शिव जी को जरूर बताए।

मणिकर्ण‍िका घाट पर महिलाओं का जाना वर्जित

दिन भर में 100 से 300 शवों का दाह संस्कार यहां पर होता है, इसलिए यहां पर महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। वैसे तो यहां पर रात को अग्नि नहीं दी जाती है, लेकिन अगर विशेष कारणों से अग्नि दी भी जानी पड़े तो उस संस्कार में परिजनों को शामिल नहीं किया जाता है।

न्यूजीलैंड के संस्थान का रिसर्च

न्यूजीलैंड के यूनीटेक इंस्ट‍िट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में वर्ष 2021 में मास्टर्स प्रोग्राम के तहत मणिकर्ण‍िका घाट पर रिसर्च किया गया, जिसका टॉपिक था Re-thinking the Manikarnika Ghat। यह रिसर्च अश्विनि राम ने किया, जिसमें कहा गया है कि मणिकर्णिका घाट, जिसके साथ हिन्‍दू समुदाय की आस्था जुड़ी है, को वृहद स्तर पर विकसित करने की जरूरत है। सबसे पहला सुझाव है कि शव दहन करने वाले लोगों की अजीविका, पर्यावरण और पर्यटन को ध्‍यान में रखते हुए यहां के आधारभूत ढांचें में परिवर्तन किए जाएं तो आस्‍था को बरकरार रखते हुए इस पूरे क्षेत्र को नया रूप दिया जा सकता है।

Manikarnika Ghat of Varanasi

रिसर्च के सुझाव इस प्रकार हैं

  • अगर इस घाट का सौंदर्यीकरण किया जाए तो न केवल वातावरण स्वच्‍छ होगा, बल्कि लाशें जलाने वाले डोम को अच्‍छा जीवन जीने का मौका मिलेगा।
  • भारत सरकार ने वाराणसी में तमाम परियोजनाएं शुरू कीं, लेकिन उसमें मणिकर्णिका घाट को शामिल नहीं किया, जबकि सरकार को इसे अहम स्थान देना चाहिए।
  • अगर घाट को अलग-अलग भागों में बांट कर शव दाह के स्थान निर्धारित कर दिये जाएं तो न केवल लोगों को आसानी होगी, बल्कि पर्यावरण की दृष्टि से भी वो अच्‍छा रहेगा।
  • अंत में रिसर्चर अश्‍विन ने बतौर आर्किटेक्ट सुझाव दिये हैं कि किस तरह से घाट को री-डिजाइन कर के इसे सुंदर और सुलभ बनाया जा सकता है।
  • एक मॉडल के माध्‍यम से ऐसे सुझाव दिए गए हैं, जिससे छतों पर दाह संस्कार करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

रिसर्चर द्वारा प्रोपोज़ की गई डिजाइन की तस्वीरें

रिसर्चर ने कैसे की गंगा जल की व्यवस्था

रिसर्चर ने अपने रिसर्च में लिखा है कि हिन्‍दू रीति रिवाजों के अनुसार शव को गंगा जल में नहलाने से मृतक को मोक्ष की प्राप्ति होती है। हर दूसरे-तीसरे शव को नदी में ले जाने से बेहतर है कि ऊपर एक बड़ा टैंक लगा दिया जाए और गंगा नदी का पानी उसमें भर दिया जाए। शव दाह क्षेत्र में पाइप के माध्‍यम से उसी गंगा जल को पहुंचा दिया जाए। इस स्थान से निकलने वाले पानी को वापस प्यूरीफायर के माध्‍यम से स्वच्‍छ बनाकर फिर से टैंक में डाल दिया जाए। ऐसा करने से नदी में होने वाले जल प्रदूषण को कम किया जा सकता है।

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