भारतीय रेलवे का इतिहास करीब 150 साल पुराना बताया जाता है। दुनिया भर के सबसे लंबे रेलवे नेटवर्क में भारत का स्थान टॉप 5 में आता है। देश के हर गांव, हर कस्बे को शहरों से जोड़ने वाली भारतीय रेलवे को अगर हमारे देश की जीवनरेखा कहा जाए, तो ऐसा कहना गलत नहीं होगा। किसी जमाने में भाप इंजन से छुक-छुककर धुआँ उड़ाती हुए चलने वाली रेलवे ने लंबा सफर तय किया और आज इलेक्ट्रिक ट्रेनों का जमाना आ चुका है।
सेमी हाई स्पीड ट्रेन वंदे भारत एक्सप्रेस 160 किमी प्रतिघंटा की रफ्तार से देश के एक कोने को दूसरे से जोड़ती है तो दूसरी ओर 320 किमी प्रतिघंटा की रफ्तार से बुलेट ट्रेन को मुंबई से अहमदाबाद के बीच चलाने की तैयारियां भी आधी से ज्यादा पूरी हो चुकी हैं। शुरुआत से लेकर अब तक भारतीय रेलवे लगातार यात्री सेवाओं में बदलाव लाती रही है। समय बदला और कभी बिना शीशे वाली खिड़कियों व लकड़ी की बेंच वाली ट्रेन की कोच की जगह आज एसी लग्जरी कोच ने ले ली है।

हर लंबी दूरी की ट्रेन में कम से कम 1 एयर कंडीशन कोच तो जरूर होता है। हम सभी जानते हैं कि भारत में कई ऐसी ट्रेनें भी चलती हैं जिनके सभी कोच ही एयर कंडीशन होते हैं और इन्हें पहियों पर चलता-फिरता महल ही कहा जाता है जैसे पैलेस ऑन व्हील्स, लग्जरी ट्रेन वंदे भारत, शताब्दी एक्सप्रेस व अन्य। लेकिन क्या आप जानते हैं, भारतीय रेलवे में एसी कोच की शुरुआत कब हुई थी? कौन सी ट्रेन में पहली बार जोड़ा गया था एसी कोच?
किस ट्रेन में पहली बार जुड़ा था एसी कोच?
भारत की ट्रेनों में पहली बार 90 साल पहले एसी कोच को जोड़ा गया था। यानी मात्र 10 साल बाद भारतीय ट्रेनों में एसी कोच अपने 100 सालों का सफर पूरा करने वाला है। यह उन दिनों की बात है जब हमारे देश पर अंग्रेजों का शासन हुआ करता था। उस समय जिस ट्रेन में पहली बार एसी कोच को जोड़ा गया था, वह ट्रेन आज भी यात्री सेवाएं देने के लिए पूरी तरह से तत्पर है। हमारे देश में पहली बार द फ्रंटियर मेल (The Frontier Mail) में एसी कोच को जोड़ा गया था।

पहली बार 90 साल पहले ट्रेन से जुड़ा था एसी कोच
द फ्रंटियर मेल की शुरुआत 1 सितंबर 1928 को हुई थी। उस समय इस ट्रेन का नाम पंजाब मेल था। मुंबई के बैलार्ड पियर स्टेशन से दिल्ली, बठिंडा, फिरोजपुर और लाहौर होते हुए पेशावर (वर्तमान पाकिस्तान) तक का सफर तय करती थी। मार्च 1930 में इस ट्रेन को सहारनपुर, अंबाला, अमृतसर के रास्ते लाहौर तक ही ले जाया जाता था।
अविभाजित भारत में लंबी दूरी में चलने वाली द फ्रंटियर मेल (तत्कालिन पंजाब मेल) में वर्ष 1934 में पहली बार एसी कोच को जोड़ा गया था। लेकिन एक सवाल यहां उठता है कि उस समय ट्रेनों में न तो बैट्री का इस्तेमाल होता था और इलेक्ट्रिक का इस्तेमाल तो होता ही नहीं था, फिर भाप इंजन से चलने वाली ट्रेन में एसी किस प्रकार से काम करता था?

भाप इंजन वाली ट्रेन में कैसे काम करता था एसी?
द फ्रंटियर मेल को अंग्रेजों के जमाने का लग्जरी ट्रेन कहा जाता था। उस समय भाप इंजन से चलने वाली यह ट्रेन 60 किमी प्रतिघंटा की रफ्तार से पटरियों पर दौड़ा करती थी। लगभग 95 साल पहले इस ट्रेन की शुरुआत टेलीग्राम लाने व ले जाने के लिए की गयी थी। आज की तरह ही उस समय भी ट्रेनों में अलग-अलग श्रेणियां हुआ करती थी।
लेकिन वर्तमान समय में किराए के आधार पर यात्रा करने की अनुमति नहीं बल्कि फर्स्ट क्लास में उन दिनों सिर्फ अंग्रेजों को ही सफर करने की अनुमति थी। इसलिए अंग्रेजों को आराम पहुंचाने के लिए बड़े ही सोच-विचार के बाद इस ट्रेन की कोच को एसी कोच में परिवर्तित कर दिया गया था। इस ट्रेन में फर्स्ट क्लास और सेकंड क्लास के यात्रियों को रास्ते में खाना भी दिया जाता था।

कैसे बना था एसी कोच?
90 साल पहले ट्रेनों के लिए एसी जैसे किसी उपकरण का आविष्कार ही नहीं किया गया था। इसलिए ट्रेन के कोचों को ठंडा रखने के लिए बोगियों के नीचे बर्फ की सिल्लियां लगायी जाती थी। हालांकि बर्फ पिघल जाने की वजह से बाद में रास्ते में बर्फ की सिल्लियों को बदल भी दिया जाता था। बाद में जब ट्रेनों में पंखे लगाए जाने लगे तब नीचे बर्फ की सिल्लियां और ऊपर चलते पंखे पूरे कोच को एसी की तरह ठंडा कर देती थी।
आज भी चलती है द फ्रंटियर मेल
पिछले लगभग 96 साल पहले द फ्रंटियर मेल का सफर शुरू हुआ था, जो आज भी जारी है। 1928 में इस ट्रेन की शुरुआत पंजाब मेल के नाम से हुई थी। बाद में 1934 में जब इस ट्रेन में एसी कोच को जोड़ा गया तो इसे द फ्रंटियर मेल के नाम से चलाया जाने लगा। वर्ष 1996 से लेकर आज तक यह ट्रेन गोल्डन टेम्पल मेल के नाम से चलती है। अब इलेक्ट्रिक से चलने वाली यह ट्रेन लगभग 1893 किमी की दूरी तय करती है। अपने पूरे सफर के दौरान 24 स्टेशनों पर इस ट्रेन का ठहराव होता है।



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