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Chhath Puja 2023 : इस साल कब है छठ पूजा? जानिए क्या है इसका रामायण-महाभारत कनेक्शन

हिंदू कैलेंडर के अनुसार कार्तिक माह शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा का आयोजन किया जाता है। 4 दिनों तक चलने वाला यह पर्व मुख्य रूप से बिहार में मनाया जाता है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश, बंगाल, राजस्थान के कई हिस्सों में भी बड़ी ही भक्ति और श्रद्धा के साथ छठ पूजा का आयोजन किया जाता है।

chhath puja 2023

इस पर्व में छठ व्रती लगभग 36 घंटों का निर्जला उपवास रखकर षष्ठी माता, जिन्हें स्थानीय भाषा में छठी मैया के नाम से पुकारा जाता है, की पूजा करते हैं। इसे डाला छठ भी कहा जाता है। हर साल दिवाली के ठीक 6 दिनों बाद छठ पर्व मनाया जाता है। इस साल सुर्यषष्ठी या छठ पूजा का आयोजन 16 नवंबर से 19 नवंबर 2023 तक किया जाएगा।

छठ पूजा 2023 का कैलेंडर

4 दिनों का छठ पर्व नहाय-खाय के साथ शुरू होता है जिसका समापन उदयमान सूर्य को अर्घ्य देकर पारण करने के साथ होता है।

  • 16 नवंबर - नहाय-खाय
  • 17 नवंबर - खरना
  • 18 नवंबर - डूबते सूर्य को अर्घ्य (सांझ घाट)
  • 19 नवंबर - उदयमान सूर्य को अर्घ्य (भोर घाट), पारण

क्या होते हैं छठ पूजा के नियम

chhath pujan samagri

छठ पूजा ही संभवतः दुनिया का एकलौता ऐसा पर्व है, जिसमें पहले डूबते सूर्य और उसके बाद उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। जिन वस्तुओं के बिना छठ पूजा को अधुरा माना जाता है, उनमें बांस से बने डाला, केला के घवद, पत्ता समेत अदरक, पत्ता समेत मूली, गन्ना, नारियल, विभिन्न प्रकार के मौसमी फल शामिल हैं। छठ पूजा के चारों दिन व्रती को नये वस्त्रों में ही पूजा करना अनिवार्य होता है।

kharna puja

4 दिनों के इस पर्व में पहले दिन छठव्रती स्नान करने के बाद पूरी तरह से शुद्ध होकर सादा व सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। इसके अगले दिन खरना तिथि होती है। इस दिन पूरा दिन व्रती उपवास रखते हैं और सूर्यास्त के बाद भगवान को भोग लगाकर ही स्वयं भोजन ग्रहण करते हैं। इस दिन भगवान को भोग में आटे से बनी रोटी, गन्ने के गुड़ से बनी खीर, फल इत्यादि चढ़ाया जाता है। इस दिन भोजन करने के बाद छठव्रती सीधा भोर घाट में भगवान सूर्य को अर्घ्य देने के बाद ही पारण कर भोजन ग्रहण करता है।

chhath

पर्व के तीसरे दिन पूरा दिन छठ व्रती भगवान सूर्य और छठी मैया को अर्घ्य चढ़ाने के लिए विभिन्न प्रकार के पकवान जैसे गुझिया, ठेकुआ, कसार आदि तैयार करते हैं। इन सभी पकवानों को तैयार करने में विशेष रूप से पवित्रता का ध्यान रखा जाता है। बता दें, खरना से लेकर छठ पर्व तक जो भी प्रसाद पकाए जाते हैं, उन्हें मिट्टी के चुल्हे पर विशेष रूप से आम की लकड़ियों की आग पर ही पकाने का नियम है। व्रती नदी, तालाब के पानी में खड़े होकर शुद्ध वस्त्रों में भगवान भाष्कर को अर्घ्य अर्पित करते हैं।

चौथे और पर्व के आखिरी दिन सूर्योदय से पहले ही छठव्रती नदियों के घाटों और तालाबों के किनारे पहुंच जाते हैं। उस दिन उदयमान भगवान सूर्य को नदी और तालाब के पानी में खड़े होकर अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद घर लौटकर छठव्रती पूजा करते और खरना के दिन से चल रहा अपना निर्जला उपवास खोलते हैं, जिसे पारण कहा जाता है।

विशेष पूजा भी होती है आयोजित

चुंकि छठ व्रत को बिहार में एक महापर्व के रूप में मनाया जाता है और स्थानीय लोगों की छठी मैया पर पूर्ण आस्था होती है। इसलिए अक्सर लोग अपनी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए मन्नत भी मांगते हैं। श्रद्धालुओं की मन्नतें छठी मैया पूरी करें, जिसके लिए वे नदी के घाटों तक दंड देते हुए पहुंचते हैं। मन्नतें पूरी करने के लिए कोशी भी बैठाया जाता है, जिसमें मिट्टी से बने हाथी की मूर्तियों के चारों तरफ घेरा बनाकर दीया सजाया जाता है और उन दीयों के चारों तरफ गन्ने को रखकर आहूति दी जाती है।

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शाम वाले घाट के दिन कोशी को व्रती अपने घर में और भोर घाट के दिन व्रती नदी-तालाब के किनारे कोशी बैठाते हैं। वहीं कुछ व्रती अपनी मन्नतों को पूरा करने के लिए छठ घाट पर अन्य व्रतियों के डाला (पूजन सामग्री) में मिठाईयां आदि वितरित भी करते हैं।

सूर्य षष्ठी व्रत को क्यों कहते हैं छठी मैया की पूजा?

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आमतौर पर एक सवाल हर किसी के मन में आता है कि छठ पूजा में लोग छठी मैया की पूजा करने की बात करते हैं लेकिन अर्घ्य भगवान सूर्य को क्यों दिया जाता है? दरअसल, इसका जवाब पौराणिक मान्यताओं में छिपी हुई है। पौराणिक मान्यता के अनुसार छठी मैया ब्रह्म देव की मानस पुत्री और भगवान सूर्य की बहन हैं। इसलिए जब सूर्य षष्ठी व्रत के दिन छठी मैया की पूजा की जाती है, तब एक प्रकार से वह पूजा भाई-बहनों की इस जोड़ी की होती है।

कहा जाता है कि जब भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना शुरू की तो उनके शरीर के दाएं भाग से पुरुष और बाएं भाग से प्रकृति उत्पन्न हुई। प्रकृति के छठें हिस्से से षष्ठी देवी उत्पन्न हुई जिनकी पूजा छठ पर्व के दिन होती है।

क्या है छठ पूजा का रामायण-महाभारत कनेक्शन?

छठ पर्व का संबंध रामायण और महाभारत काल से भी है। रामायण के अनुसार जब रावण की हत्या कर भगवान राम ने माता सीता को मुक्त करवाया, उसके बाद उन्होंने ब्राह्मण हत्या के पाप से मुक्ति के लिए राजसूय यज्ञ किया। इसके बाद ऋषि मुग्दल ने एक दिन भगवान राम और माता सीता को अपने आश्रम में बुलवाया। उन्होंने माता सीता से कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवान सूर्य की उपासना का आदेश दिया। तब ऋषि मुग्दल के आश्रम में रहकर ही माता सीता ने उपवास किया और भगवान सूर्य की उपासना की।

chhath puja

वहीं महाभारत के अनुसार दानवीर कर्ण भगवान सूर्य के भक्त थे। वह पानी में खड़े होकर भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया करते थे ताकि उनपर भगवान सूर्य की कृपा बनी रहे। इसके बाद से ही भगवान सूर्य को अर्घ्य देने की प्रथा शुरू हो गयी। कहा जाता है कि कर्ण का पालन-पोषण जिन लोगों के घर हुआ वे मूल रूप से बिहार के दरभंगा के रहने वाले थे। इसलिए बिहार में छठ पर्व को सबसे ज्यादा मनाया जाता है। दूसरी कथा के अनुसार जब जुए के खेल में पांडव अपना राजपाट सब हार गये तो द्रौपदी ने पांडवों को उनका राजपाट दिलाने के लिए छठ व्रत किया था। कहा जाता है कि इसके प्रभाव से ही पांडवों को उनका खोया हुआ राजपाट फिर से प्राप्त हो सका था।

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