उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में विंध्य पहाड़ी पर सीना तानकर खड़ा कालिंजर का किला, जिसे भारत का अपराजेय दुर्ग माना जाता है। 6ठी शताब्दी में बना यह किला हजारों साल बाद भी अपने अंदर इतिहास के साथ-साथ कई खौफनाक रहस्यों को भी समाये हुए है।

इस किले को मराठाओं से लेकर मुगलों तक ने जीतने की कोशिश तो की लेकिन सबको खाली हाथ ही वापस लौटना पड़ा। कालिंजर किले में आपको ऐसी कई गुफाएं भी मिलेंगी जो शुरू तो होती हैं लेकिन कहां खत्म होती है, इसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता। इन गुफाओं में कहीं पानी टपकता रहता है तो कहीं पातालगंगा के होने की बातें कही जाती हैं। कहा जाता है कि इन रहस्यमयी गुफाओं का उपयोग किले की सुरक्षा के लिए किया जाता था।
आइए कालिंजर किले के इतिहास और खौफनाक रहस्यों के बारे में बताते हैं
अपराजेय था यह दुर्ग
इतिहासकारों का मानना है कि कालिंजर किले पर कब्जा करने के इरादे से महमूद गजनवी, कुतुबुद्दीन ऐबक, हुमायूं से लेकर शेर शाह सूरी तक ने हमला किया लेकिन कोई भी इसपर अपना झंडा नहीं फहरा सका। कहा जाता है कि पृथ्वीराज चौहान से लेकर पेशवा बाजीराव तक ने इसे हासिल करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था।

लेकिन किले की 5 मीटर मोटी और 108 फुट ऊंची दिवारों पर इनके तोपों के गोले का कोई असर ही नहीं होता था। यह किला जिस पहाड़ी पर था उसकी चढ़ाई भी काफी दुर्गम थी। इस वजह से ही इस किले को अपने दौर का सबसे मजबूत किला माना जाता है।
मुगलों के शासन की वजह बना कालिंजर
शेर शाह सूरी जिसने हुमायुं को हराकर सूरी साम्राज्य की स्थापना की थी, उसने भी कालिंजर पर जीत हासिल करने की कोशिश की थी। 1545 ई. में शेर शाह सूरी कालिंजर किले पर कब्जा करने की कोशिश में मारा गया। इसके बाद हुमायुं को मौका मिल गया और दिल्ली सल्तनत पर मुगलों का शासन लागू हो गया जो अगले 300 सालों तक बरकरार रहा।

हुमायुं ने भी इस किले पर कब्जे की कोशिश तो की लेकिन वह नाकामयाब रहे। लेकिन 1569 में अकबर ने इस किले को जीता और अपने नवरत्न बीरबल को इसे तोहफे में दे दिया। जब राजा छत्रसाल ने पेशवा बाजीराव की मदद से बुंदेलखंड से मुगलों को भगाया उस समय से लेकर अंग्रेजों के आने तक यह किला राजा छत्रसाल के साम्राज्य का हिस्सा रहा।
गुप्तकाल में किले की मौजूदगी के मिले साक्ष्य
यह किला कितना पुराना है, इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि चीनी यात्री व्हेंग त्सांग ने भी कालिंजर किले का उल्लेख अपनी यात्रा संस्मरण में किया था। कहा जाता है कि इस किले में कुछ ऐसे शीलालेख भी मिले हैं जो इसके गुप्तकाल में भी होने की गवाही देते हैं।

चंदेलों ने अपने 400 सालों के शासनकाल में इसे अपनी राजधानी बनाया था। इस किले में जितनी भी लड़ाईयां लड़ी गयी सभी खजाने और किले की खासियतों की वजह से ही लड़ी गयी। कहा जाता है कि किले में आज भी कहीं खजाने का पूरा का पूरा जखिरा छिपा पड़ा हुआ है।
भगवान शिव ने की थी तपस्या
कालिंजर किले का हिंदू धर्म में काफी ज्यादा महत्व है। कहा जाता है कि समुद्र-मंथन के बाद विषपान करने के बाद भगवान शिव इसी स्थान पर आए थे। यहीं पर भगवान शिव ने तपस्या कर अपनी ज्वाला को शांत किया था। कालिंजर प्रांगण में मौजूद नीलकंठ मंदिर को यहां का सबसे पूजनीय स्थान माना जाता है। इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग प्राचीनतम माना जाता है।

कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण नागों ने करवाया था जिसका जिक्र पुराणों में भी मिलता है। नीलकंठ मंदिर के ऊपर पानी का प्राकृतिक स्रोत है, जो कभी नहीं सुखता है। माना जाता है कि पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र में सुखा पड़ जाए लेकिन नीलकंठ मंदिर का जलस्रोत कभी नहीं सुखता है।
रात को सुनायी देती है घुंघरु की झंकार
कालिंजर किले का एक गहरा रहस्य यह भी है कि दिन के समय तो यह किला शांत दिखायी देता है लेकिन सूरज के डूबते ही किले में हलचल मचनी शुरू हो जाती है। इस किले में रात के अंधेरे में घुंघरुओं की आवाज सुनायी देती है। किले को लेकर रिसर्च करने वाले दल को एक रात वहां रुकना पड़ा तब उन्हें भी घुंघरुओं की आवाज सुनायी दी थी।

किले में मौजूद रानीवास में रहने वाली नर्तकी पद्मावती की घुंघरुओं की आवाज हजारों साल बाद आज भी किले में गुंजती है। कहा जाता है कि पद्मावती भगवान शिव की भक्त थी। इसलिए कार्तिक पूर्णिमा की रात को वह दिल खोलकर नाचती है।
कैसे पहुंचे कालिंजर किला

कालिंजर किले का नजदीकी एयरपोर्ट खजुराहो है, जो किले से 100 किमी की दूरी पर है। खजुराहो से कालिंजर जाने के लिए आपको किराए पर गाड़ी लेनी होगी। कालिंजर किले का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन बांदा है, जो किले से 35 किमी की दूरी पर है। बांदा जिला मुख्यालय है। इसलिए यहां से कालिंजर के लिए किराए पर गाड़ियां उपलब्ध है। यह किला सुबह 8 से शाम 6 बजे तक खुला रहता है। किले में प्रवेश शुल्क 25 रुपये है।



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