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कुम्भलगढ़, जहाँ की दीवारें ग्रेट वॉल ऑफ चाइना के समान मज़बूत हैं, हमला करने से डरते थे दुश्मन

Posted By: Staff

भारत में पर्यटन की बात हो और हम राजस्थान को भूल जाएं तो फिर भारत में पर्यटन की बात अधूरी रह जाती है। ज्ञात हो कि राजस्थान का शुमार पूरे विश्व के सबसे खूबसूरत टूरिस्ट डेस्टिनेशनों में होता है। भारत का ये खूबसूरत राज्य हमेशा ही अपनी विशेष सभ्यता और अनोखी संस्कृति के लिए जाना गया है। इसी क्रम में आज अपने इस आर्टिकल के जरिये हम आपको अवगत करा रहे हैं राजस्थान के एक ऐसे शहर से जिसके अंदर मौजूद किले कि दीवारें ग्रेट वॉल ऑफ चाइना के समान मज़बूत हैं।

राजसी गढ़, राजस्थान में ऐतिहासिक किलों की सैर!

जी हां हम बात कर रहे हैं कुम्भलगढ़ की। कुम्भलगढ़, राजस्थान के राजसमन्द जिले में स्थित एक विख्यात पर्यटन स्थल है। यह स्थान राज्य के दक्षिणी भाग में स्थित है और कुम्भलमेर के नाम से भी जाना जाता है। कुम्भलगढ़ किला राजस्थान राज्य का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण किला है। इसका निर्माण पंद्रहवी सदी में राणा कुम्भा ने करवाया था। पर्यटक किले के ऊपर से आस पास के रमणीय दृश्यों का आनंद ले सकते हैं। शत्रुओं से रक्षा के लिए इस किले के चारों ओर दीवार का निर्माण किया गया था।

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ऐसा कहा जाता है कि चीन की महान दीवार के बाद यह एक सबसे लम्बी दीवार है। गौरतलब है कि राजस्थान के अन्य स्थलों की तरह, कुम्भलगढ़ भी अपने शानदार महलों के लिए प्रसिद्ध है जिसमें बादल महल भी शामिल है । यह ईमारत 'बादलों के महल' के नाम से भी जानी जाती है। आइये इस लेख के जरिये जानें कि कुम्बलगढ़ की यात्रा पर आपको वहां क्या क्या करना चाहिए।

कुम्भलगढ़ किला

कुम्भलगढ़ किला

कुम्भलगढ़ किले का निर्माण पंद्रहवी सदी में राजा राणा कुम्भा ने करवाया था। यह मेवाड़ किला बनास नदी के तट पर स्थित है। पर्यटक बड़ी संख्या में इस किले को देखने आते हैं क्योंकि यह किला राजस्थान राज्य का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण किला है। यह विशाल किला 13 गढ़, बुर्ज और पर्यवेक्षण मीनार से घिरा हुआ है। कुम्भलगढ़ किला अरावली की पहाड़ियों में 36 किमी में फैला हुआ है। इसमें महाराणा फ़तेह सिंह द्वारा निर्मित किया गया एक गुंबददार महल भी है। लंबी घुमावदार दीवार दुश्मनों से रक्षा के लिए बनवाई गई थी, और ऐसा माना जाता है कि लंबाई के मामले में इसका स्थान चीन की महान दीवार के बाद दूसरा है।

नीलकंठ महादेव मंदिर

नीलकंठ महादेव मंदिर

नीलकंठ महादेव मंदिर, कुम्भलगढ़ किले के पास स्थित है। इस मंदिर में पत्थर से बना हुआ छह फुट का शिवलिंग है। यह पवित्र स्थल भगवान शिव को समर्पित है जो कि इस क्षेत्र के मुख्य देवता हैं। इतिहास के अनुसार राजा राणा कुम्भा इस देवता की पूजा करते थे, और एक अप्रिय घटना में उनके अपने ही पुत्र ने उनका सिर धड से अलग कर दिया जब वे इस पवित्र स्थल पर पूजा कर रहे थे।

रणकपुर जैन मंदिर

रणकपुर जैन मंदिर

रणकपुर जैन मंदिर को जैनियों के पांच महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों में गिना जाता है। अरावली पहाड़ियों के पश्चिमी ओर स्थित यह मंदिर भगवान आदिनाथ जी को समर्पित है। हल्के रंग के संगमरमर का बना यह मन्दिर बहुत सुंदर लगता है। किंवदंतियों के अनुसार, एक जैन व्यापारी सेठ धरना शाह और मेवाड़ के शासक राणा खम्भा द्वारा इस मंदिर का निर्माण किया गया था। मन्दिर के मुख्य परिसर चमुखा में कई अन्य जैन मंदिर शामिल हैं। मंदिर का तहखाना 48,000 वर्ग फुट पर फैला है। उस युग के कारीगरों की स्थापत्य उत्कृष्टता यहाँ के 80 गुंबदों, 29 हॉलों और 1444 खंभों पर दिखती है।

बादल महल

बादल महल

बादल महल को ‘बादलों के महल' के नाम से भी जाना जाता है। यह कुम्भलगढ़ किले के शीर्ष पर स्थित है। इस महल में दो मंजिलें हैं एवं यह संपूर्ण भवन दो आतंरिक रूप से जुड़े हुए खंडों, मर्दाना महल और जनाना महल में विभाजित हैं। इस महल के कमरों को पेस्टल रंगों के भित्ति चित्रों के साथ चित्रित किया गया है जो उन्नीसवीं शताब्दी के काल को प्रदर्शित करते हैं। फिरोजी, हरा एवं सफेद इन भव्य कमरों के मुख्य रंग हैं।

मम्मदेव मंदिर

मम्मदेव मंदिर

मम्मदेव मंदिर का निर्माण राजा राणा कुम्भा ने वर्ष 1460 में करवाया था। यह तीर्थ कुम्भलगढ़ किले के नीचे स्थित है और इसमें चार तख्ते हैं। पर्यटक तख्तों पर खुदे हुए शिलालेख देख सकते हैं जो मेवाड़ का इतिहास बताते हैं। यहाँ इतिहास गुहिल के काल से प्रारंभ होकर राणा कुम्भा के समय तक लिखा गया है। गुहिल मेवाड़ के संस्थापक थे। वर्तमान में ये तख्ते उदयपुर के संग्रहालय में सुरक्षित रूप से रखे हुए हैं। पर्यटक मंदिर के भीतर धन के देवता कुबेर की छवि एवं दो कब्रों को देख सकते हैं।

 कुम्भलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य

कुम्भलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य

कुम्भलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य, उदयपुर - पाली - जोधपुर रोड पर उदयपुर से 65 किमी की दूरी पर स्थित है और कुम्भलगढ़ के किले को घेरता है। अभयारण्य, जो 578 वर्ग किमी के क्षेत्र में फैला हुआ है, इस किले से अपना नाम पाता है और राजसमंद, उदयपुर, और पाली जिले के कुछ हिस्सों को शामिल करता है। यह राजस्थान का एकमात्र अभयारण्य जहां भेड़िये को पाया जा सकता है। अन्य जंगली जानवरों में यहां हायना, सियार, तेंदुए, आलसी भालू, जंगली बिल्लियाँ, साँभर, नीलगाय, चौसिंघा (चार सींग वाले हिरण), चिंकारा, और खरगोश शामिल हैं।

वेदी मंदिर

वेदी मंदिर

वेदी मंदिर, कुम्भलगढ़ किले के हनुमान पोल के पास स्थित है। यह जैन मंदिर राणा कुंभा ने तीर्थयात्रियों के बलिदान के सम्मान में बनवाया था। इसके बाद महाराणा फ़तेह सिंह ने इस मंदिर का नवीनीकरण करवाया। यह मंदिर देश के बचे हुए कुछ बलि स्थानों के अवशेषों में से एक माना जाता है।

परशुराम मंदिर

परशुराम मंदिर

परशुराम मंदिर एक प्राचीन गुफा के अंदर स्थित है एवं प्रसिद्ध संत परशुराम को समर्पित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार संत परशराम ने भगवान् राम का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए यहाँ तपस्या की थी। पर्यटकों को गुफा तक पहुँचने के लिए 500 सीढियां उतरनी पड़ती हैं।

कैसे जाएं कुम्भलगढ़

कैसे जाएं कुम्भलगढ़

फ्लाइट द्वारा : कुम्भलगढ़ के सबसे नजदीक का हवाईअड्डा उदयपुर में स्थित महाराणा प्रताप हवाईअड्डा या डबोक हवाई अड्डा है जो कुम्भलगढ़ से 84 किमी की दूरी पर स्थित है। यह हवाई अड्डा इंदिरा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डा, नई दिल्ली के अलावा जयपुर और जोधपुर से भी लगातार उड़ानों द्वारा जुड़ा हुआ है। यात्री महाराणा प्रताप हवाई अड्डे से कुम्भलगढ़ जाने के लिए उचित कीमतों पर प्री-पेड टैक्सी सेवा का लाभ उठा सकते हैं।

रेल द्वारा : कुम्भलगढ़ के सबसे पास का रेलवे स्टेशन फलना में स्थित है। यह जंक्शन और रेलवे स्टेशन मुंबई, जयपुर, अजमेर, दिल्ली, अहमदाबाद और जोधपुर से लगातार चलने वाली रेलगाड़ियों द्वारा जुड़ा हुआ है। यहाँ से कुम्भलगढ़ जाने के लिए कैब्स उपलब्ध हैं।

सड़क मार्ग द्वारा : यात्री इस स्थान तक बसों द्वारा भी पहुँच सकते हैं। पर्यटक आकर्षणों जैसे कि उदयपुर, अजमेर, जोधपुर एवं पुष्कर से कुम्भलगढ़ जाने के लिए सरकारी एवं निजी बसें उपलब्ध हैं।

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