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भारत के टॉप 8 बेहद दिलकश और सुंदर लेकिन गुमनाम स्मारक

By Syedbelal

ट्रैवल करना किसे नहीं पसंद होता, हर कोई यही चाहता है कि वो अपने खाली समय या अपनी छुट्टियों में ज्यादा से ज्यादा घूमें। अब जब किसी भी व्यक्ति का ट्रैवल डेस्टिनेशन इंडिया हो तो यहां ऐसा बहुत कुछ है जो किसी का भी मन मोह सकता है। कहा जा सकता है कि घूमने की दृष्टि से भारत में ऐसा बहुत कुछ है जो और कहीं नहीं है। आज देश में घूमने और देखने को इतना है कि ये किसी भी पर्यटक को कंफ्यूज कर सकता है।

प्रायः ये देखा गया है कि घूमने के शौक़ीन ज्यादातर लोग पॉपुलर डेस्टिनेशन की तरफ ही रुख करते हैं और उन स्मारकों, डेस्टिनेशनों को छोड़ देते हैं जिनके बारे में वो नहीं जानते। तो इसी क्रम में आज अपने इस आर्टिकल के जरिये हम आपको अवगत कराएंगे भारत के उन गुमनाम स्मारकों से जिनकी सुंदरता किसी भी पर्यटक को अपनी तरफ मोहित कर सकती हैं।

आइये इस लेख के जरिये गहराई से जाना जाये कि आखिर ऐसी क्या वजहें हैं जिनके चलते हम आपको इन खूबसूरत स्मारकों को अवश्य देखने का सुझाव दे रहे हैं।

सलीम सिंह की हवेली

सलीम सिंह की हवेली जैसलमेर रेलवे स्टेशन के करीब स्थित है। इस खूबसूरत इमारत को सलीम सिंह के द्वारा 1815 ई0 में बनाया गया था। इसे जहाजमहल भी कहा जाता है क्योंकि इसके सामने का हिस्सा एक जहाज की तरह दिखता है। इमारत की छत धनुषाकार और नीले कपोलों के साथ ढकी हुई है। पर्यटक नक़्क़ाशीदार कोष्ठकों से सजी छत, जो एक मोर जैसी दिखती है, को देख सकते हैं। सलीम सिंह की हवेली के पूरा होने के बाद ही मेहता परिवार इसमें रहने लगा था। इस इमारत में 38 बाल्कनी हैं जिनका डिजाइन एक दूसरे से पूरी तरह अलग है। इमारत का प्रवेश द्वार कई हाथियों द्वारा संरक्षित है। पर्यटक जैसलमेर शहर से रिक्शे के द्वारा इस हवेली तक पहुँच सकते हैं।

बड़ा बाग

बड़ा बाग एक विशाल पार्क अपने शाही स्मारकों या छतरियों के लिए प्रसिद्ध है जिसे विभिन्न भट्टी शासकों द्वारा निर्मित किया गया। सब के बीच, राजा महारावल जैत सिंह की कब्र सबसे प्राचीन स्मारक है। यह जगह जैसलमेर शहर से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। पार्क के अंदर स्मारकों के अलावा, पर्यटक जैतसार टंकी, जैत बांध और एक गोवर्धन स्तंभ को भी देख सकते हैं। बांध और टंकी दोनों के निर्माण में पत्थरों के ठोस टुकड़ों का इस्तेमाल किया गया था। जैसलमेर शहर से रिक्शा और टैक्सी से पर्यटक इस पर्यटक स्थल तक पहुँच सकते हैं।

मकबरा मखदूम याह्या मनेरी

राजस्थान के जैसलमेर में स्थित मखदूम याह्या मनेरी का मकबरा एक सूफी संत मखदूम याह्या मनेरी की याद में बनवाया गया था। इतिहासकारों कि मानें तो इस मकबरे का निरामं 13वीं शताब्दी में हुआ था। कहा जाता है कि संत के अंदर दिव्या शक्ति थी और इनके पास आने वाला कोई भी फरियादी खाली हाथ नहीं जाता था। ये मक़बरा एक मस्जिद के पास स्थित है और दिलचस्प बात ये है कि यहां के स्थानीय लोगों में संत और उनके चमत्कारों को लेके कई कहानियां प्रचलित हैं ।

चीनी का रौजा

यह एक मकबरा है और इसका नामकरण इसमें मुख्य रूप से प्रयुक्त होने वाली रंगीन चीनी टाइल्स पर हुआ है। चीनी का रौजा महान विद्वान व कवि और मुगल बादशाह शाहजहां के प्रधानमंत्री मुल्लाह शुकरुल्लाह शिराजी की कल्पना का परिणाम है। 1935 में निर्मित यह मकबरा युमना नदी के किनारे पर है और एतमादुद दौला के मकबरे से एक किमी दूर है। भारत में यह अपने तरह का पहला निर्माण था, जिसमें विस्तृत रूप से चमकदार कांच के टाइल्स का प्रयोग किया गया था। इसलिए इसे भारत में भारतीय व पर्सियन वास्तुशिल्प शैली से बना ऐतिहासिक स्थल होने का गौरव प्राप्त है। मकबरे का निर्माण आयताकार आकार में किया गया है और इसमें मुख्य रूप से भूरे पत्थर का इस्तेमाल किया गया है। इसके दीवार को रंगीन टाइल्स से सजाया गया है और उनपर इस्लामिक लिखावट के चिन्ह देखे जा सकते हैं।

कांच महल

सिकंदरा में अकबर के मकबरे के बगल में स्थित वर्गाकार कांच महल मुगल वास्तुशिल्प की विशेषताओं का जीता-जागता उदाहरण है। रिकॉर्ड से पता चलता है कि इसका निर्माण 1605 से 1619 के बीच किया गया था। इसके निर्माण में टाइल्स का भरपूर स्तेमाल हुआ है, इसलिए इसे कांच महल कहा जाता है। इसका बाहरी हिस्सा पलास्टर के जरिए नक्काशीदार लाल पत्थर से जड़ा हुआ है।इसमें कई वृत्ताकार स्थान है, जिसमें मदिरा रखने के बर्तन, फूल की लताएं और ज्यामितीय डिजाइन बनी हुई हैं। कांच महल का निर्माण पहले शाही औरतों के हरम के तौर पर किया गया था। बताया जाता है कि बाद में इस जगह का इस्तेमाल जहांगीर ने अपनी शिकार गाह के रूप में किया।

एतमादुद दौला का मकबरा

मुगल बादशाह अकबर के बेटे जहांगीर ने अपनी बेगम नूरजहां के पिता मिर्जा गियास बेग को एतमादुद दौला का खिताब दिया था। एतमादुद दौला और उनकी पत्नी अस्मत जहां का यह मकबरा 1622 से 1628 के बीच उनकी बेटी नूरजहां ने बनवाया था। इस मकबरे की भव्यता और महिमा को देखकर ऐसा लगता है कि यह ताजमहल की पूर्ववर्ती रचना या ड्राफ्ट हो। इसी कारण इसे बेबी ताज और ज्वेल बॉक्स भी कहा जाता है। 23 स्क्वायर मीटर में फला यह मकबरा यमुना नदी के पूर्वी किनारे पर बना है। एनएच-2 पर स्थित राम बाग सर्किल से यह सिर्फ दो किमी दूर है। इस मकबरे का निर्माण चार बाग नाम से चर्चित पर्सियन गार्डन के बीच में लाल पत्थर के स्तंभ पर किया गया है।

मार्बल पैलेस

कोलकाता स्थित मार्बल पैलेस का निर्माण राजा राजेंद्र मलिक द्वारा करवाया गया था। इस स्थान की ख़ास बात ये है कि यहाँ आने के बाद आपको ओरिजिनल बंगाली वास्तुकला के दर्शन होंगे। आपको बता दें कि इस महल के निर्माण में सफ़ेद संगमरमर का इस्तेमाल किया गया था। यदि आप इस महल को देखने आएँगे तो आपको मिलेगा कि महल के सामने एक सुंदर गार्डन का निर्माण किया गया है। ज्ञात हो कि आज भी राजवंश का परिवार यहां वास करता है और जब आप यहां आएँगे तो आपको इन राजवंश के लोगों द्वारा महल के चप्पे चप्पे के बारे में बताया भी जाएगा।

बोलगट्टी पैलेस

केरल के कोच्ची स्थित बोलगट्टी पैलेस भारत का एकमात्र ऐसा महल है जिसका निर्माण किसी भारतीय राजा ने नहीं कराया था। कहा जाता है कि इस महल का निर्माण 1744 में डचों द्वारा कराया गया था और इसको बनाने का मुख्य उद्देश्य शत्रुओं और बाहरी आक्रमणकारियों से रक्षा थी। आज इस महल में गार्डन स्विमिंग पूल और आयुर्वेद सेंटर भी हैं। यदि आप प्रकृति के साये में फुर्सत के कुछ पल बिताना चाहते हैं तो ये आपके लिए एक परफेक्ट डेस्टिनेशन है।

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