हिंदू धर्म रीति-रिवाजों से भरा हुआ है। जन्म से लेकर मृत्यु तक एक व्यक्ति को अपने जीवन में कई तरह के रीति-रिवाजों का पालन करना पड़ता है। सिर्फ मृत्यु तक ही नहीं बल्कि हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार मृत्यु के बाद भी उसके साथ कई रिवाज जुड़े रहते हैं। ऐसा ही एक रिवाज पिंडदान का भी होता है।

कहा जाता है कि जब तक पितृपक्ष में परिवार के सदस्य अपने पितरों को तर्पण और पिंडदान नहीं करते हैं, तब तक जीवन-मृत्यु के चक्र से उन्हें मुक्ति नहीं मिलती है। हर साल पितृपक्ष के दौरान देश के कई शहरों में पिंडदान करने के लिए नदियों के किनारे लोग पहुंचते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीराम ने अपने पिता राजा दशरथ को 3 जगहों पर पिंडदान किया था। पहला पिंडदान उन्होंने संगमतट पर प्रयागराज में, दूसरा काशी और तीसरा गया धाम में किया था। कहा जाता है कि इसके बाद से ही पितरों को पिंडदान करने का प्रचलन शुरू हुआ था।
आइए उन शहरों के बारे में बताते हैं जहां पिंडदान करना महत्वपूर्ण माना जाता है :-
गया
बिहार का एक महत्वपूर्ण शहर गया है। यहां पितृपक्ष मेले में पितरों को पिंडदान और तर्पण करने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं। गया में फल्गु नदी के तट पर पिंडदान की व्यवस्था की जाती है। लोग पहले फल्गु नदी में डूबकी लगाकर खुद को पवित्र करते हैं और उसके बाद ब्राह्मणों द्वारा बताए तरीकों से अपने पितरों को पिंडदान की प्रक्रिया संपन्न करते हैं। कहा जाता है कि यहां पिंडदान करते समय मरे हुए संबंधियों के अपने आस-पास होने का अहसास भी होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान राम ने भी अपने पिता दशरथ को तीसरा पिंडदान गया में ही किया था।

बद्रीनाथ
बड़ा चार धाम में से एक बद्रीनाथ में अलकनंदा का तट पिंडदान करने के लिए एक महत्वपूर्ण जगह माना जाता है। यहां ब्रह्म कपाल घाट पर पिंडदान समारोह का आयोजन किया जाता है। पहले लोग नदी के पवित्र जल में डूबकी लगाते हैं और फिर ब्राह्मणों द्वारा बताए गये तरीकों से मंत्र जाप करते हुए अपने पूर्वजों को पिंडदान करते हैं ताकि उनकी दिवंगत आत्मा को शांति और मुक्ति मिल सके।
वाराणसी
पितृपक्ष के दौरान पिंडदान करने की भारत में सबसे पवित्र जगह वाराणसी का गंगा घाट माना जाता है। यहां गंगा घाटों पर पिंडदान समारोह का आयोजन करने की काफी पुरानी प्रथा है। पिंडदान के लिए यहां स्थानीय पंडित पूरी विधि-विधान के साथ अनुष्ठान आयोजित व उसे संपन्न करवाते हैं। वाराणसी एक ऐसी जगह है जहां जीवन और मृत्यु दोनों को ही पवित्र व शुभ माना जाता है।

पुष्कर
पुष्कर में भगवान ब्रह्मा का एकमात्र मंदिर है। और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान ब्रह्मा का जन्म भगवान विष्णु की नाभि से हुआ था। इस वजह से यह माना जाता है कि पुष्कर की पवित्र झील भी भगवान विष्णु की नाभि से ही निकली है। इस झील के आसपास कुल 52 घाट हैं और इनमें से कई घाटों पर आश्विन माह की कृष्णपक्ष से शुरू होने वाली पितृपक्ष में पिंडदान समारोह आयोजित की जाती है।
उज्जैन
भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक महाकाल की नगरी उज्जैन में पिंडदान करने का अपना अलग महत्व है। उज्जैन के भैरवगढ़ क्षेत्र में क्षिप्रा नदी के तट पर पिंडदान समारोह का आयोजन किया जाता है। इस स्थान पर एक बरगद का पेड़ है, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसे माता पार्वती ने अपने हाथों से लगाया था। मुगल शासकों ने इस पेड़ को नष्ट करने का प्रयास भी किया था लेकिन वह विफल रहा। मान्यता के अनुसार उज्जैन में ही भगवान कार्तिकेय का मुंडन हुआ था। पौराणिक मान्यता के अनुसार महाभारत के युद्ध के बाद ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर ने उज्जैन में ही अपने कुल के सभी भाई-बंधुओं को पिंडदान किया था।
अयोध्या
रामजन्म भूमि होने की वजह से अयोध्या एक पवित्र तीर्थ स्थान है। इसलिए यह पिंडदान करने के सबसे पवित्र स्थानों में एक माना जाता है। अयोध्या में पवित्र सरयू नदी के किनारे भात कुंड में ब्राह्मणों की देख-रेख में पिंडदान समारोह का आयोजन किया जाता है। पूरे पिंडदान अनुष्ठान के दौरान ब्राह्मण ही अध्यक्ष की भूमिका निभाते हैं।
इन जगहों के अलावा कोलकाता, प्रयागराज, हरिद्वार, मथुरा, जगन्नाथ पुरी में भी पिंडदान का काफी महत्व है। कहा जाता है कि अपने परिवार के सदस्यों के हाथों से पिंडदान स्वीकार करने के बाद पूर्वजों को प्रेतयोनी से मुक्ति मिल जाती है। यूं तो इन सभी जगहों पर पिंडदान पूरे साल चलता रहता है, लेकिन हिंदू कैलेंडर के अनुसार आश्विन कृष्णपक्ष की 1 तारीख से अमावश्या तक किया गया पिंडदान एवं पितृतर्पण काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। अमावश्या के दिन को महालया भी कहा जाता है जिसके अगले दिन से पितृपक्ष समाप्त होकर देवीपक्ष (नवरात्रि) की शुरुआत होती है। खासतौर पर महालया के दिन किया गया पितृतर्पण विशेष महत्व रखता है।



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