भगवान श्रीकृष्ण के जितने रूप, उतने ही मंदिर और हर मंदिर से जुड़ा कोई ना कोई दिलचस्प किस्सा। कहीं भगवान श्रीकृष्ण को बेटा, भाई या प्रेमी के रूप में पूजा जाता है तो कहीं श्रीकृष्ण सखा के तौर पर पूजे जाते हैं। किसी मंदिर में माखनचोर को भोग में माखन-मिश्री चढ़ाया जाता है तो श्रीकृष्ण के किसी मंदिर में रात के समय सजाए गए बिस्तर पर सुबह रहस्यमई तरीके से सलवटें दिखाई देती हैं।

लेकिन क्या आपने कभी किसी मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण को 21 तोपों की सलामी देने के बारे में सुना है? जी हां, हम भगवान कृष्ण के जिस मंदिर के बारे में बात कर रहे हैं वह राजस्थान में स्थित है और यह मंदिर लगभग 400 साल पुराना बताया जाता है। राजस्थान के नाथद्वारा शहर में स्थापित श्रीनाथ जी मंदिर में जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण को 21 तोपों की सलामी दी जाती है। भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप के दर्शन करने के लिए सिर्फ देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी इस मंदिर में लोग आते रहते हैं। बता दें, मुकेश अंबानी के बेटे अनंत अंबानी और उनकी मंगेतर राधिका मर्चेंट का रोका भी इसी मंदिर में हुआ था।
कौन हैं श्रीनाथ जी?
श्रीनाथ जी वैष्णव संप्रदाय के केंद्रीय देवता हैं। वल्लभाचार्य ने पुष्टीमार्ग वल्लभ संप्रदाय की स्थापना की थी। उनके बेटे विट्ठलनाथ जी भगवान श्रीनाथ जी के बड़े ही भक्त थे। नाथद्वारा शहर में श्रीनाथ जी की भक्ति का प्रचार-प्रसार करने का श्रेय उन्हें ही जाता है। श्रीनाथ जी, भगवान श्रीकृष्ण का ही 7 वर्षीय बाल स्वरूप है, जब उन्होंने भगवान इंद्र के प्रकोप से बृजवासियों को बचाने के लिए अपनी छोटी ऊंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठा लिया था। नाथद्वारा में स्थापित श्रीनाथजी की मूर्ति देश के कई शहरों में घूम चुकी है।

कई शहर होते हुए मूर्ति पहुंची नाथद्वारा
राजस्थान के नाथद्वारा में स्थापित श्रीनाथ जी की मूर्ति पहले आगरा और ग्वालियर में गयी थी। जब मुगल बादशाह औरंगजेब ने हिंदू मंदिरों को ध्वस्त करने का आदेश दिया तो वहां के महंत इसे लेकर पहले वृंदावन, फिर जयपुर और मारवाड़ पहुंचे। इसके बाद सुरक्षा के दृष्टि से बाड़मेर के तत्कालीन पाटोदी ठाकुर ने इसका बीड़ा उठाया। 6 महीने तक श्रीनाथ जी पाटोदी में विराजे और जब इस बात का पता औरंगजेब को चला तो महंत ने मूर्ति को लेकर मेवाड़ का रुख किया।
इसके बाद कोठारिया के ठाकुर और महाराणा राजसिंह ने अपनी जान पर खेलकर नाथद्वारा में श्रीनाथ जी को स्थापित करवाया था। कहा जाता है कि जब मूर्ति को लेकर रथ आगे बढ़ रही थी, तब रथ का पहिया कीचड़ में फंस गया। इसलिए महाराणा ने इसी गांव में श्रीनाथ जी की मूर्ति स्थापित करने का फैसला लिया।
श्रीनाथ जी की हवेली
नाथद्वारा में स्थापित श्रीनाथ जी के मंदिर को 'श्रीनाथ जी की हवेली' कहा जाता है। इस मंदिर में दूध के लिए स्टोर रुम, सुपाली के लिए स्टोर रुम, चीनी और मिठाइयों के लिए एक स्टोर रुम, फूलों के लिए स्टोर रुम, रसोई घर, आभूषण कक्ष, रथ (अश्वशाला) और बैठक मौजूद है। श्रीनाथ जी मंदिर में आने वाले भक्त अपने साथ चावल के दाने लेकर आते हैं। जन्माष्टमी की पूजा के बाद चावल के इन दानों को वे अपनी तिजोरी में संभाल कर रख देते हैं। ऐसा माना जाता है कि चावल के इन दानों में उन्हें श्रीनाथ जी की छवि दिखाई देती है और घर में धन-धान्य की कोई कमी नहीं होती है।

नाथद्वारा मंदिर में जो प्रमुख उत्सव मनाएं जाते हैं वह निम्न हैं :
- हरियाली अमावश्या
- जन्माष्टमी
- दशहरा
- दीपावली
- अन्नकूट
- मकर संक्रांति
- इसके साथ ही क्षेत्रिय त्योहार जैसे तीज, गणगौर भी बड़े ही धुमधाम से मनाया जाता है।
जन्माष्टमी पर तोपों की सलामी की परंपरा
उदयपुर से करीब 40 किमी दूर नाथद्वारा में मौजूद श्रीनाथ जी के मंदिर जन्माष्टमी के मौके पर विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। इस समय सिर्फ देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी आने वाले कृष्णभक्तों की संख्या काफी ज्यादा होती है। जन्माष्टमी के समय रात को ठीक 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण को 21 तोपों की सलामी दी जाती है। जिन दो तोपों से भगवान को सलामी दी जाती है, उन्हें नर और मादा तोप कहा जाता है। हर साल मंदिर के प्रशिक्षित होमगार्ड इस परंपरा का निर्वाह करते हैं और इन्हीं तोपों से भगवान श्रीकृष्ण को सलामी दी जाती है।
नादिर शाह नहीं लूट पाया था मंदिर
मंदिर के बारे में जब नादिर शाह को पता चला तो इसे लूटने के इरादे से वह वर्ष 1793 में नाथद्वारा पहुंचा। मंदिर के बाहर एक फकीर ने उसे इस मंदिर में लूटपाट चलाने से मना भी किया था, लेकिन नादिर शाह कहां मानने वाला था। कहा जाता है कि जैसे ही उसने मंदिर के अंदर प्रवेश किया, उसके आंखों की रोशनी चली गयी। मंदिर में बिना लूट-पाट किये जैसे ही उसने मंदिर की चौखट के बाहर कदम रखा, उसकी आंखों की रोशनी वापस लौट आयी। श्रीनाथ जी के मंदिर की इस महिमा को देखकर उसने मंदिर में लूट-पाट करने का इरादा छोड़ दिया।



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