भारत में त्योहारों की सूची में देव दीवाली का अपना अलग ही महत्व होता है। कार्तिक माह की अमावस्या तिथि को जहां दीवाली के दीयों से घर-आंगन और पूरे शहर को रोशन कर दिया जाता है। वहीं कार्तिक माह की पूर्णिमा को जब चांद आसमान में अपनी पूरी रोशनी बिखेर रहा होता है, ठीक उसी समय देव दीवाली पर नदियों और तालाबों के घाटों पर जलाए गये दीयों की रोशनी चांद की चमक को भी फीकी करने की कोशिशों में लगे होते हैं।
जिस तरह होली का नाम लेते ही ब्रजभूमि, दीवाली का नाम लेते ही सबसे पहले श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या का नाम याद आता है, ठीक उसी तरह देव दीवाली पर बनारस की बात की निराली होती है।

कब है देव दीवाली?
इस साल देव दीवाली 15 नवंबर को मनायी जाएगी। भगवान शिव की नगरी काशी यूं तो साल भर यहां आने वाले पर्यटकों से गुलजार रहता है लेकिन देव दीवाली के मौके पर खासतौर पर यहां बड़ी संख्या में देश और विदेशों से पर्यटक पहुंचते हैं। इसके साथ ही बनारस के स्थानीय निवासी भी पूरे जोश के साथ देव दीवाली को मनाते हैं। एक तरह से कहा जा सकता है कि वाराणसी में गंगा के घाटों पर दीवाली से भी कहीं ज्यादा दीयों की जगमगाहट देव दीवाली पर होती है।
क्यों मनायी जाती है देव दीवाली?
दीवाली से ठीक 15 दिनों बाद देव दीवाली का त्योहार मुख्य रूप से वाराणसी में मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन दिन देवताएं स्वर्ग से धरती पर उतरते हैं और पवित्र गंगा में डुबकी लगाते हैं। इसलिए गंगा घाटों पर लाखों की संख्या में दीये जलाकर उन्हें जगमगाया जाता है।

इन दीयों की रोशनी से उत्सव का माहौल बनता है। इस साल भी वाराणसी में लगभग 8 किमी के दायरे में फैले गंगा के सभी 84 घाटों को मिट्टी के परंपरागत दीयों से रोशन किया जाएगा। इसके साथ ही गंगा नदी में भी दीयों को बहाया जाता है, जो देखने में बहुत ही सुन्दर और एक जादुई सा माहौल बनाते हैं।
देव दीवाली की Timing
देव दीवाली पर गंगा घाटों पर घूमने जाने का सबसे अच्छा समय शाम 5 से रात 9 बजे के बीच का होता है। इस समय के दौरान ही सभी घाटों पर दीयों को जलाया जाता है और गंगा नदी में जलते हुए दीयों को तैरने के लिए छोड़ा जाता है। देव दीवाली कार्तिक पूर्णिमा पर 15 नवंबर को मनायी जाएगी। पंचांग के अनुसार पूर्णिमा 15 नवंबर को दोपहर में शुरू होगी जो 19 नवंबर को शाम 5.10 बजे तक रहेगी।

इस नजारे को आप घाटों पर बैठे-बैठे या फिर नाव की सवारी करते हुए एंजॉय कर सकते हैं। इस दौरान अपने साथ कैमरा लेकर जाना बिल्कुल मत भूलें। यकीन मानिए अगर फोटोग्राफी में आपका हाथ ज्यादा बैठा हुआ नहीं है, तब भी उस समय आपका कैमरा ऐसे-ऐसे नजारों को कैद कर सकता है, जिन्हें देखकर बाद में आप खुद अपनी फोटोग्राफी के हुनर की तारीफ किए बिना नहीं रह सकेंगे।
सबसे कम और सबसे ज्यादा भीड़ वाले घाट?
वाराणसी के सबसे ज्यादा लोकप्रिय घाट दशाश्वमेध और अस्सी घाट होते हैं। जो आम समय में गंगा आरती की वजह से और देव दीवाली के समय भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना रहता है। यहां देव दीवाली की शाम को लाखों की तादाद में स्थानीय लोग और पर्यटक पहुंचते हैं। लेकिन आप अगर देव दीवाली के त्योहार को शांतिपूर्ण तरीके से मनाना और इन खूबसूरत नजारों को दिल में बसाना चाहते हैं तो आपको सीधा पंचगंगा घाट पहुंचना चाहिए।

वाराणसी के सबसे पुराने घाटों में एक पंचगंगा घाट देव दीवाली के लिए बड़ा ही महत्वपू्र्ण माना जाता है। कहा जाता है कि इस घाट का निर्माण महाभारत काल ऋषि भृगु द्वारा किया गया था। यहां 5 नदियों का संगम होता है जो हैं - गंगा, सरस्वती, धुपपापा, यमुना और किराना। हालांकि इस घाट पर भी मुगल शासक औरंगजेब ने अपनी तबाही के निशान छोड़े थे लेकिन इसके बावजूद इस घाट की वास्तुकला आज भी लोगों को आकर्षित करती है।
नावों की बुकिंग
देव दीवाली पर बड़ी संख्या में पर्यटक नावों पर सवार होकर शाम को गंगा नदी में सैर करते हैं और दीयों से सजे विभिन्न घाटों की सुन्दरता को निहारते हैं। अगर आप भी देव दीवाली के दिन नावों को बुक करना चाहते हैं, तो आपको यहां नावों के कई विकल्प मिल जाएंगे।
सामान्य नावों के साथ-साथ वाराणसी के घाटों पर आपको डबल डेकर नाव और लग्जरी क्रूज का विकल्प भी मिलेगा और हर तरह की नाव में आपको अलग-अलग अनुभव मिलेगा। चुंकि देव दीवाली पर बड़ी संख्या में पर्यटक गंगा घाटों का रुख करते हैं, इसलिए नावों की बुकिंग पहले से करना ही बेहतर होगा।



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