झाँसी एक ऐतिहासिक शहर है जिसने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। हरे-भरे बगिचों और सुन्दर परिदृश्यों से सजा झाँसी का किला मुख्य रूप से झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की वजह से लोकप्रिय है। इसी किले में ब्याह कर पहली बार मनु (मणिकर्णिका) ने रानी लक्ष्मीबाई बनकर कदम रखा था।

धीरे-धीरे किले का हर कोना नन्हीं मनु के पायलों की झनकार से गुंज उठी थी। लेकिन एक समय ऐसा आया जब इसी किले में उसे अपनों ने ही धोखा दिया और यहीं धोखा महज 29 सालों की रानी लक्ष्मीबाई की हार की वजह बन गयी।
आइए आपको झाँसी के इस किले का इतिहास बताते हैं :
झाँसी के किले का निर्माण
1613 में झाँसी के किले का निर्माण ओरछा के राजा बीर सिंह जूदेव ने करवाया था। यह किला एक पहाड़ी किले का अच्छा उदाहरण है। किले में मुख्य द्वार के ठीक सामने एक तोप रखा हुआ है जिसे 'कड़क बिजली तोप' कहा जाता है। इस तोप को गुलाम गौस खां चलाया करते थे, जिससे बिजली कड़कने की आवाज आती थी।

इस तोप में आज भी जंग नहीं लगी है। इसी किले में मौजूद है पंच तलीय महल। इस महल के पहले तल में रानी लक्ष्मीबाई रहा करती थी। इसी महल के भूतल का प्रयोग वह सभा कक्ष के रूप में करती थी। किले के अंदर मराठा शैली में बना एक गणेश मंदिर भी है, जहां रानी हर रोज पूजा करने आती थी।
उत्तराधिकार के अभाव में रानी ने संभाली बागडोर
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और राजा गंगाधर राव की कोई संतान नहीं थी। इस कारण गंगाधर राव ने अपने चचेरे भाई के बेटे दामोदर राव को गोद ले लिया। कालचक्र में गंगाधर राव बीमार रहने लगे और उनकी मृत्यु हो गयी। उनकी मृत्यु के पश्चात रानी लक्ष्मीबाई कुछ समय तक तो शोकमग्न रही। इस बीच बेटे को गोद लेने वाली बात का पता जब अंग्रेज अधिकारियों को लगा तो झाँसी के सिंघासन पर उन्होंने दामोदर राव की दावेदारी को खारिज कर दिया। अंग्रेजों ने रानी लक्ष्मीबाई को 60,000 रुपये वार्षिक पेंशन देने के साथ ही महल छोड़ देने का आदेश दिया। रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी की कमान संभाली और 375 दिनों तक झाँसी पर राज किया।
जिनपर किया विश्वास उन्होंने ही दिया धोखा
राजपाट को सुचारू रूप से चलाने के लिए रानी लक्ष्मीबाई ने मंत्रीमंडल का गठन किया, जिसमें उन्होंने अपने वफादारों और विश्वासपात्रों को शामिल किया। लेकिन यही रानी की सबसे बड़ी भूल हो गयी। 20 सदस्यीय मंत्रीमंडल में 18वें नंबर पर थे दूल्हा जू और 20वें नंबर पर पीर अली शामिल थे। झाँसी के किले में प्रवेश करना अंग्रेजों के लिए कभी भी आसान नहीं था।

ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक अंग्रेज 8 दिनों तक लगातार झाँसी के किले पर गोले बरसाते रहे, दिन ही नहीं अंग्रेज रात के अंधेरे में भी किले पर हमला करते थे। इसके बावजूद यह किला उनके हाथ नहीं आ रहा था। तब अंग्रेजों ने एक चाल चली और प्रलोभन देकर दूल्हा जू और पीर अली को अपनी तरफ शामिल कर लिया।
दरबारी का विश्वासघात
रानी लक्ष्मीबाई के दरबारी दूल्हा जू अंग्रेजों के झांसे में आ गया और उसने रात के अंधेरे में किले का दक्षिणी द्वार जिसे ओरछा गेट कहा जाता था, उसे खोल दिया। यह द्वार एक संरक्षित द्वार था। द्वार खुलने के बाद झाँसी की सेना को तैयार होने का समय नहीं मिल सका। अंग्रेजों की सेना झाँसी के इस अभेद्य किले में घुस गयी और उन्होंने झाँसी जीत लिया।

किले के ही एक स्थान, जिसे आज कुदान स्थल के नाम से जाना जाता है, से अपने गोद लिये बेटे के साथ रानी लक्ष्मी बाई ने घोड़े पर बैठ कर किले के बाहर छलांग लगा दी। इस जगह की ऊंचाई को देखकर हर कोई दंग रह जाता है कि निडर रानी ने इतनी ऊंचाई से छलांग कैसे लगाई होगी। रानी लक्ष्मीबाई को किले से बाहर निकालने में उनकी सहेली और दुर्गा वाहिनी की सेनापति झलकारी बाई का योगदान अविस्मरणीय है।
झाँसी के किले के अन्य आकर्षण
झाँसी के किले की सिर्फ ऐतिहासिक गाथा ही नहीं बल्कि शानदार वास्तुकला भी लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करती है। इस किले की गिनती भारत के सबसे ऊंचे किलों में होती है।
इस किले में घूमने वाली कई जगहें हैं :
- हर्बल गार्डन जहां करीब 20,000 प्रकार के पेड़-पौधे लगे हुए हैं।
- रानी महल, किले का वह क्षेत्र जहां रानी लक्ष्मीबाई निवास करती थी।
- रानी लक्ष्मीबाई पार्क, रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगाता पार्क जो काफी सुन्दर दिखता है।
- गंगाधर राव की छत्री, यह झाँसी के राजा गंगाधर राव का स्मारक है। इसका निर्माण लक्ष्मीबाई ने ही करवाया था।
- संग्रहालय, यहां झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ही नहीं बल्कि राजपरिवार से संबंधित कई वस्तुएं प्रदर्शित की जाती हैं।
झाँसी का किला कैसे पहुंचे और प्रवेश शुल्क
झाँसी का किला सुबह 8 बजे से खुल जाता है और शाम को 5 बजे यह बंद हो जाता है। इस किले में प्रवेश करने के लिए भारतीय नागरिकों को ₹25 प्रवेश शुल्क देना पड़ता है। झाँसी का किला झाँसी रेलवे स्टेशन से सिर्फ 3 किमी की दूरी पर है। रेलवे स्टेशन से किला तक आने के लिए रिक्शा या तीन पहिया वाहन आसानी से मिल जाएगा। झाँसी में कोई एयरपोर्ट नहीं है। झाँसी से नजदीकी एयरपोर्ट ग्वालियर है जो यहां से लगभग 100 किमी की दूरी पर है।



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