राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण की स्थिति में थोड़ा सुधार होने के बाद एक बार फिर से कोहरे की मोटी परत ने इसे अपनी चपेट में ले लिया है। सोमवार और मंगलवार को दिल्ली में वायु प्रदूषण से थोड़ी राहत तो मिली लेकिन शनिवार की सुबह एक बार फिर से दिल्ली में वायु की गुणवत्ता का औसत सूचकांक (AQI) 420 पर पहुंच गया। पूरे दिल्ली व NCR में GRAP-4 तो लागू है लेकिन प्रदूषण से राहत मिलने के आसार कम ही नजर आ रहे हैं।
इस वक्त अगर दिल्ली को वायु प्रदूषण से कोई चीज मुक्ति दिला सकती है तो वह है बारिश।

बारिश वातावरण से धुल-कण और प्रदूषण फैलाने वाले कारकों को साफ करने का प्राकृतिक तरीका है। हालांकि इस सीजन में बारिश पूरी तरह से गायब ही नजर आ रहा है। पिछले 1 अक्तूबर से 22 नवंबर के बीच दिल्ली में कहीं भी बारिश नहीं हुई है। राहत की अभी दूर-दूर तक कोई संभावना भी दिखाई नहीं दे रही है क्योंकि बारिश होने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं।
सर्दियों के मौसम में पृथ्वी की नीचली सतह के पास की हवा सघन होती है जिस कारण वायुमंडल का सबसे निचला भाग यानी ग्रहीय सीमा परत की हवा काफी पतली होती है। गर्म हवा के नीचे फंसी हुई ठंडी हवा एक प्रकार का पर्यावरणीय स्थिति 'LID' बनाती है। यह घटना शीतकालीन इंवर्शन कहालाता है। चुंकि हवा का वर्टिकल मिश्रण सिर्फ इसी परत के अंदर होता है, इसलिए प्रदूषण कारक कणों को वातावरण में फैलने के लिए ज्यादा जगह नहीं मिल पाती है।
तापमान में गिरावट और सर्दियों में बारिश का अभाव

लगातार कोहरे की मोटी चादर से घिरे रहने की वजह से दिल्ली और NCR मैदानी इलाकों में अधिकतम और न्यूनतम तापमान में गिरावट दर्ज की गयी है। इस बारे में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, भुवनेश्वर के स्कूल ऑफ अर्थ, ओशन एंड क्लाइमेट के सहायक प्रोफेसर डॉ. वी. विनोज का कहना है कि पारे में गिरावट से वातावरण में स्थिरता जैसी परिस्थिति बन जाती है और यहीं ठंडी स्थितियां वातावरण में वर्टिकल मिश्रण को रोकती हैं। इससे प्रदूषण के कण सतह के पास ही जमा होने लगते हैं।
आने वाले दिनों में मौसम विशेषज्ञ तापमान में और भी गिरावट की उम्मीद कर रहे हैं। मौसम विशेषज्ञ महेश पलवत का कहना है कि उत्तर पश्चिमी ठंडी हवाएं मैदानी इलाकों में पहुंचने के बाद तापमान में और भी गिरावट होगी। इसकी वजह से प्रदूषण कारक कणों का वातावरण से गायब होना काफी मुश्किल होगा। न्यूनतम तापमान में जितनी गिरावट होगी, इनवर्जन परत उतनी ही ज्यादा मोटी होती जाएगी। इनवर्जन परत के मोटे होने से सूरज की रोशनी या हवाओं का इस परत के आरपार जाना मुश्किल हो जाएगा और प्रदूषण का स्तर भी बढ़ता जाएगा।
उन्होंने आगे कहा कि अब तक के सभी पश्चिमी विक्षोभ, जो उत्तर भारत में बारिश की वजह बनते हैं, कमजोर ही रहे हैं। ये मौसम को प्रभावित करने में अक्षम रहे। हमने जम्मु और कश्मीर के ऊपरी इलाकों में हल्की बारिश और बर्फबारी तो देखी लेकिन उससे ज्यादा कुछ नहीं। बारिश की कमी की वजह से वातावरण से प्रदूषण के कण धुल नहीं पा रहे हैं और वे लंबे समय तक बने रह पा रहे हैं। इस वजह से ही दिल्ली में जल्दी कोहरा बनना शुरू हो गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन से सिंधु-गंगा के मैदानों (IGP) में प्रदूषण का स्तर और अधिक बढ़ सकता है। जलवायु परिवर्तन से वायुमंडलीय परिसंचरण और वर्षा के पैटर्न में परिवर्तन होने की भी संभावना है जिसका मौसम के पैटर्न पर असर पड़ेगा। इस वजह से वायु की गुणवत्ता खराब हो सकती है या यूं कहें प्रदूषण का स्तर खासतौर पर सिंधु-गंगा के मैदानों में बढ़ने की संभावना है।
इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, दिल्ली के प्रोफेसर डॉ. साग्निक दे का कहना है कि दिल्ली और आसपास के इलाके इन दिनों जलवायु परिवर्तन जैसी परिस्थिति की वजह से इन दिनों जुझ रही है, जिसका परिणाम ही वायु की खराब गुणवत्ता है। जलवायु परिवर्तन के साथ ही मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों ने इसके प्रभाव को कई गुना बढ़ा दिया है, जिसका साक्षी इन दिनों दिल्ली बन रहा है।

न सिर्फ सर्दियों की बारिश अनियमित हो गयी है बल्कि पश्चिमी विक्षोभ की तीव्रता भी बदल गयी है जिसकी वजह से ही उत्तरी मैदानी इलाकों में बारिश होती है। इसके बाद वैश्विक तापमान का बढ़ना इस परिस्थिति को और भी गंभीर बना रहा है क्योंकि मौसम के परिस्थितियों में परिवर्तन हमारे हाथों में नहीं है।
प्रोफेसर डॉ. डे ने कहना है कि उत्सर्जन को नियंत्रित करना ही इस समय की मांग है, वर्ना प्रदूषण इसी तरह से कई गुना बढ़ता रहेगा।



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