दिल्ली हो या कोलकाता रास्ते में चलते-फिरते भूख लगने पर सबसे पहला विकल्प हमेशा काठी रोल का ही ध्यान में आता है। मसालेदार चिकेन को पराठे में कायदे से मोड़कर बनाये जाने वाले इस डिश को याद कर हर किसी के मुंह में पानी आ जाता है।

लेकिन क्या आपने गौर किया है कि इन Rolls में काठी (लकड़ी) नहीं होने के बावजूद इन्हें काठी रोल कहा जाता है। चलिए हम आपको इसकी वजह बताते हैं-
काठी रोल की शुरुआत
माना जाता है कि देश में सबसे पहले काठी रोल बनाना कोलकाता में शुरू हुआ था। कोलकाता के निजाम रेस्तरां में 1932 में इन Rolls को बनाना शुरू किया गया था। यह वह दौर था जब भारत में अंग्रेजी शासन था और रेस्तरां में मुख्य तौर पर अंग्रेज अधिकारी ही खाना खाने आया करते थे।

काम के बीच हल्के-फुल्के स्नैक्स के लिए कबाब खाना अंग्रेजों को काफी पसंद आता था। रेस्तरां में लोहे की सींख में कई तरह के कबाब मिलते थे जिनका स्वाद लेने हर शाम को अंग्रेज अफसर इस रेस्तरां में आते थे। लेकिन इन सींखों का रख-रखाव करने में रेस्तरां को काफी मुश्किलें आती थी।
कबाब से बना काठी रोल
जैसा हम सभी जानते हैं कबाब को बनाने के लिए उनके बीच में सींख घुसायी जाती है। पहले कबाब बनाने के लिए लोहे की सींख का इस्तेमाल किया जाता था जिसका कालांतर में बांस से बनी लकड़ियों ने स्थान ले लिया। बांस की छोटी और पतली लकड़ी को बांग्ला भाषा में काठी कहा जाता है। चुल्हे से निकालकर लायी गयी गर्म कबाबों को खाने में अंग्रेजों को काफी परेशानी भी होती थी और गर्म कबाबों को खाने में काफी समय भी लग जाता था।

इसलिए इस काम को आसान बनाने के लिए कबाब को पराठों में मोड़ कर परोसा जाने लगा। काठी में बने कबाबों को पराठों में मोड़कर रोल बनाने की वजह से इन्हें काठी रोल कहा जाने लगा। आज काठी रोल सिर्फ कोलकाता ही नहीं देशभर के कई शहरों में सबसे ज्यादा खाया जाने वाला स्ट्रीट फुड बन चुका है।



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