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इतिहासकारों के लिए हमेशा ही क्यों ख़ास रही है बलिदानों की भूमि फतेहगढ़ साहिब

By Super

देश के सबसे छोटे राज्यों के अंतर्गत आने वाला पंजाब हमेशा ही पर्यटन की दृष्टि से ख़ास रहा है। आज पंजाब का शुमार देश के उन राज्यों में है जो अपनी समृद्धि से राज्य को एक ख़ास मुकाम दे रहा है। बात यदि इस खूबसूरत राज्य में मौजूद पर्यटन के आयामों की हो तो आपको बता दें कि यहां ऐसा बहुत कुछ है जिसके चलते देश दुनिया के पर्यटक इस खूबसूरत राज्य की तरफ आकर्षित हो रहे हैं।

Read in English: Travel to the Historic Town of Fatehgarh Sahib, Punjab

तो इसी क्रम में आज हम आपको अपने इस लेख के जरिये अवगत कराने जा रहे हैं पंजाब के एक ऐसे डेस्टिनेशन से जिसका शुमार यहां के सबसे ऐतिहासिक शहरों में है। जी हां हम बात कर रहे हैं फतेहगढ़ साहिब की। फतेहगढ़ साहिब, पंजाब राज्य में स्थित एक ऐतिहासिक शहर है। इस शहर का पंजाब के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है और इसे युद्ध भूमि के रूप में भी जाना जाता है।

आपको बताते चलें कि फतेहगढ़ साहिब पर्यटन का विशेष महत्व यहां मौजूद प्रसिद्ध गुरुद्वारा फतेहगढ़ साहिब के कारण है। इसी जगह गुरु गोबिंद सिंह जी के दोनों पुत्रों साहिबज़ादा फ़तेह सिंह और साहिबज़ादा जोरावर सिंह ने शहादत दी थी।

तो अब देर किस बात की आइये इस लेख के जरिये जानें कि अपनी फतेहगढ़ साहिब यात्रा पर ऐसा क्या है जो आपको अवश्य देखना चाहिए।

गुरुद्वारा फतेहगढ़ साहिब

सरहिंद-मोरिंदा सडक पर स्थित गुरुद्वारा फ़तेहगढ़ साहिब सिखों का एक मुख्य धार्मिक स्थल है। ऐसा विश्वास है कि वर्ष 1704 में साहिबज़ादा फतेहसिंह और साहिबज़ादा जोरावर सिंह को सरहिंद के फौजदार वज़ीर खान के आदेश पर दीवार में जिंदा चुनवा दिया गया था। यह गुरुद्वारा उन्हीं की शहादत की याद में बनाया गया था।

Photo Courtesy: Jasleen Kaur

गुरुद्वारा के अंदर परिसर में कई प्रसिद्ध संरचनाएं हैं जैसे कि गुरुद्वारा भोरा साहिब, गुरुद्वारा बुर्ज माता गुजरी, गुरुद्वारा शहीद गंज, टोडरमल जैन हॉल एवं सरोवर। प्रवेशद्वार सफ़ेद पत्थर से बनाया गया है और यह संगमरमर से बने एक सफेद रास्ते की ओर ले जाता है। गुरुद्वारे का मुख्य विशिष्ट सिख वास्तुकला का नमूना है जिसमें सफ़ेद पत्थर की संरचनाएं एवं स्वर्ण गुंबद है।

शहीदों के बलिदान की स्मृति में दिसंबर के महीने में यहाँ शहीदी जोर मेला मनाया जाता है। यहाँ की स्थिरता एवं शांतता पर्यटकों को एक वास्तविक ऐतिहासिक स्थल देखने का अवसर प्रदान करती है।

आम ख़ास बाग़

आम ख़ास बाग़, मुग़ल बादशाह बाबर द्वारा राजमार्ग पर बनवाई गई एक सराय के अवशेष हैं। बाद में शाहजहाँ द्वारा इसका पुनर्निर्माण किया गया क्योंकि कई शाही परिवार लाहौर जाते समय यहाँ रूकते थे। आम ख़ास बाग़ परिसर का एक वातानुकूलित तंत्र, जिसे सरद खाना कहा जाता है, ध्यान देने योग्य है।

इस परिसर में स्थित दौलत-खाना-ए-ख़ास या शीशमहल एक ऐसा स्मारक है जिसे सजावटी दीवारों, मीनारों, टैंकों, फव्वारों और सुंदर चमकदार टाइल्स वाले गुंबदों के साथ सजाया गया था। हमाम में भी पानी गर्म करने के लिए कुशलतापूर्वक विशेष भूमिगत टेराकोटा चैनल्स बनाये गए थे।

प्रति वर्ष शहीदी ज़ोर मेले के समय यहाँ एक लाईट एंड साउंड (प्रकाश एवं ध्वनि) प्ले, जिसे सरहिंद की दीवार कहते हैं, का आयोजन किया जाता है।

Photo Courtesy: Quality check

संघोल

संघोल अपने पुरातात्विक संग्रहालय के लिए प्रसिद्ध है जिसमें सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष और कलाकृतियां रखी गई हैं। इसे उछ पिंड संघोल के नाम से भी जाना जाता है और फतेहगढ़ साहिब से यह 18.9 किमी दूर है। सडक द्वारा यह दूरी तय करने में 28 मिनट का समय लगता है। तोरामाना और मिहिरकुल, जो कि मध्य एशिया के शासक थे, संबंधित मुहरें एवं सिक्के भी यहाँ मिले हैं।

वर्ष 1968 में एक बौद्ध स्तूप भी यहाँ खोजा गया था। वर्ष 1985 में, मथुरा स्कूल ऑफ़ आर्ट (मथुरा कला विद्यालय) से संबंधित पहली और दूसरी शताब्दी ईस्वी की लगभग 117 पत्थर की संरचनाएं खुदाई के दौरान यहाँ प्राप्त हुई थीं। संघोल संग्रहालय में हड़प्पन सभ्यता के अवशेष बड़ी संख्या में देखे जा सकते हैं।

Photo Courtesy: Simoncanada

इस संग्रहालय में 15,000 से भी अधिक कलाकृतियां हैं और इसलिए यह स्थान इतिहासकारों एवं कलाप्रेमियों बीच बहुत प्रसिद्ध है। मुख्य सडक पर पर्यटक पहली एवं दूसरी शताब्दी में निर्मित एक बौद्ध स्तूप एवं मठ देख सकते हैं।

माता चक्रेश्वरी देवी जैन मंदिर

माता चक्रेश्वरी देवी जैन मंदिर सरहिंद-चंडीगढ़ रोड पर एक गाँव अत्तेवाली में स्थित है। माता चक्रेश्वरी देवी की कथाएं पृथ्वीराज चौहान के समय से चली आ रही हैं। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, कुछ तीर्थयात्री बैलगाड़ियों में जैन मंदिरों की यात्रा कर रहे थे। उन्होंने रास्ते में माता चक्रेश्वरी देवी की मूर्ती खरीदी।

माता चक्रेश्वरी देवी भगवान् आदिनाथ की प्रबल अनुयायी थीं। रात भर रूकने के बाद जब यात्रियों ने उस गाड़ी को हिलाने का प्रयत्न किया जिसमें माता की मूर्ती रखी हुई थी तो वह बैलगाड़ी चली ही नहीं। अचानक आकाशवाणी हुई, "इस स्थान को मेरा आवास रहने दो"। आश्चर्यजनक रूप से उस बंजर भूमि में पानी का एक फ़व्वारा भी उभर आया।

प्रतिवर्ष दशहरे के बाद चौथे दिन यहाँ एक धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है, जिसे देखने के लिए भक्त बड़ी संख्या में यहाँ आते हैं।

कैसे जाएं फतेहगढ़ साहिब

फ्लाइट द्वारा : फतेहगढ़ साहिब में हवाई अड्डा नहीं है परंतु यात्री चंडीगढ़ या अमृतसर तक फ्लाईट ले सकते हैं। चंडीगढ़ और अमृतसर दोनों ही जगहों से कैब या बस के माध्यम से आसानी से यहां पहुंचा जा सकता है।

ट्रेन द्वारा : फतेहगढ़ साहिब रेलवे स्टेशन एक अच्छे रेल नेटवर्क के जरिये देश के सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। साथ ही ये यहां पहुंचने का एक बेहद सस्ता विकल्प है।

सड़क मार्ग द्वारा : यात्री, देश और राज्य के महत्वपूर्ण शहरों को जोड़ने वाली निजी और सार्वजनिक बसों का प्रयोग कर सकते हैं। एनएच 1 हाईवे यहां आने का सबसे बेहतर माध्यम है क्योंकि बिना बाधा के आप इस हाईवे पर सुगमता से चल सकते हैं।

बलिदानों की भूमि रहा है फतेहगढ़ साहिब

Photo Courtesy: CIAT

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